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Sunday, 1 December 2013

beejakshara mantra Universal Strategy (Worldly people's perception)

People's concept and philosophy

Tulsidas ji
Nowadays people's concept and philosophy has totally changed about god and his perception. They are thinking about modern culture and creating a dynamic routine in their daily life but they don't satisfied in reality. they are living tense for work and time.

There are two types of people in the world. First is selfish, which is only concerned with his work and do not care of others. Such People become oblivious to knowing everything and they do not reaction for injustice or evil on others. Second types of people seems wealth and fascination or illusory trap everything on this world and they are suspect about god exist.


Hence such people don't ever realize that happiness and satisfaction, and for be happy in life, they should start to praise and adoration of God.

संसारी लोगों की रीति (धारणाएँ):-महाग्रंथ रामचरितमानस के रचियता महाकवि तुलसीदास जी ने आज के युग के बारे में पहले से ही अनुमान लगा लिए था और उन्होंने एक नीति शास्त्र की रचना भी कि थी जिसमे उन्होंने कई नीतिगत व्याख्यान दिए और बताया कि मनुष्य भी कई तरह के होते है और इन सब का उन्होंने इस नीति शस्त्र में उल्लेख किया है | मैं नीति शास्त्र कि ज्यादा चर्चा न करते हुए, नीति शास्त्र के इस दोहे पर ध्यान केंद्रित करना चाहूँगा | तुलसीदास जी ने इस पंक्ति में यह सपष्ट किया है कि मानव आज के युग में अपने स्वार्थ को सिद्ध करने के लिए क्या करता है और जो मानव जीवन का परम उद्देश्य है और जिस उद्देश्य के लिए मनुष्य को मृत्युलोक में आना पडता है उसको भुलाकर वह मोहवश क्या-क्या करता है |

अर्थात तुलसीदास जी ने यह स्पष्ट करना चाहा है की मनुष्य का मुख्य उद्देश्य उस परमपिता परमात्मा की प्राप्ति का प्रयत्न करना है पर मानव आज के इस घोर अंधकार-मय जगत में तथा इसकी चकाचौंध भरी माया में समझता है कि :- यहाँ तो उजाला ही उजाला है और जो खुशियाँ यहाँ है वो तो कहीं नहीं है | परन्तु जब अंत समय आता है तो मनुष्य का न तो पैसा कम आता है और न ही यश और समृद्धि और न ही प्रारब्ध काम आता है, काम आता है तो केवल पूर्ण जन्म के पुण्य और धर्म, जो मनुष्य पूरे जीवन कल में नहीं करता है | अत: तुलसीदास जी ने ऐसे लोगो पर नीति व्यंग्य रूप में कटाक्ष किया है और उन्हें सही रस्ते पर आने कि प्रेरणा दी है |

In English:-
 Hare charhin taphi bare jarat fare pasarhin hath |
 tulsi swarth meet sab parmarth raghunath ||


In Hindi:-
 हरे चरहिं तपही बरे जरत फरे पसारहिं हाथ |
 तुलसी स्वारथ मीत सब परमार्थ रघुनाथ ||

भावार्थ:- अर्थात तुलसीदास जी ने कहा है कि जब घोर कलियुग आएगा तब मनुष्य इतना स्वार्थी हो जायेगा कि जहाँ उसे लाभ और अपना फायदा दिखेगा वो उसी काम को करेगा और मानवता लुप्त होती चली जायेगी | तथा मनुष्य जी कथनी और करनी में बड़ा अंतर आ जायेगा, और मनुष्य को ही मनुष्य का चरित्र समझ में नहीं आएगा कि क्या सही है और क्या गलत | और तो और तुलसीदास जी तो यह भी कह गए कि मनुष्य का कोई मित्र नहीं होगा, सब मित्र, सगा सम्बन्धी स्वार्थ के पीछे है, जब स्वार्थ खत्म तो सबकुछ समाप्त | अत: तुलसीदास जी ने कहा है कि सब स्वार्थ के नाते है और सबसे बड़ा परमार्थ तो रघुनाथ ही है और मनुष्य को उनका स्मरण करते रहना चाहिए |

Thursday, 28 November 2013

beejakshara mantra Aasan Shuddhi Mantra or Purification Of Worship Seat

आसन शुद्धि मंत्र 

किसी भी तरह की पूजा स्तुति और शुभारंभ से पहले जिस आसन पर आप विराजमान होना चाहते है उस पर बैठने से पहले नीचे दिए गए इस मंत्र से आसन को शुद्ध का लेना चाहिए | तथा पूजन करने के लिए आसन का शुद्ध होना अति आवश्यक है |

आसन शुद्धि:- आसन अर्थात वह स्थान जहाँ से आप परमपिता परमेश्वर के आराधना करते है, अतएव आसन का शुद्ध होना अत्यंत आवश्यक है | पूजा करने के आसन को शास्त्रों में उच्च स्थान का दर्जा प्राप्त है क्योकि यही आसन परमेश्वर से मनुष्य के जुडाव का हेतु है | अत: इस सेतु अर्थात आसन की शुद्धि होना अति आवश्यक है |



Kusha Aashan
आसन शुद्धि मंत्र इस प्रकार से है :-

Mantra in Hindi:-

ऊँ पृथ्वीत्वया धृता लोकादेवि त्वं विष्णुना धृता,
 त्वं च धारय मां देवि पवित्र कुरु चासनम् ||

Mantra in English:-

Ohm Prithvitvaya Dhrita Lokadevi Tvam Vishnuna Dhrita, 
Tvam Cha Dharay Maam Devi Pavitra Kuru Chasanam ||

आसन शुद्धि करने हेतु इस मंत्र को बोलते समय जल से आसन पर जल के छीटें देवें | इस प्रकार से आसन कि शुद्धि होती है तथा आसन शुद्धि से ही पूजा तथा जप कि पवित्रता बढती है तथा उच्च विचारों का आवागमन होता है और शांति तथा ध्यान कि प्राप्ति होती है | यह शुद्धि आसन के साथ साथ आपके विचारों तथा मन के विचारणीय वेग को आद्यात्मिकता कि ओर अग्रसर कर जीवन को निर्मल कर देती है |

अत: कभी भी पूजन अथवा स्तुति करते समय बिना शुद्धि किये आसन पर नहीं बैठना चाहिए |

beejakshara mantra Mantra To Sanctification (Pavitrikarana)

पवित्रीकरण (शुद्धि) मंत्र 

पवित्रीकरण का मंत्र सभी प्रकार कि पूजा, नित्य उपासना, संध्याकालीन स्तुति आदि में अति आवश्यक है और अशुद्धि से पूजा करना निषेध माना जाता है |

पवित्रीकरण:- पवित्रीकरण और शुद्धि का अर्थ स्वयं तथा वातावरण कि शुद्धि ही नहीं होता है, अपितु यह धार्मिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है | यथा जब आप कभी भी पूजा पाठ अथवा स्तुति करते है तो यह कल्पना करते है कि मंदिर (पूजा स्थान) स्वच्छ है और आप भी स्नानादि से निवृत होकर पाठ पूजन कर रहे और यही पवित्रीकरण है, यह उचित नहीं है |



क्योकि बिना शुद्धि के बुद्धि और ज्ञान की वृद्धि नहीं हो सकती है अत: शुद्धि सत्संग और स्तुति के लिए परम आवश्यक है |

शास्त्रों और पुराणों में शुद्धि को बड़ा महत्त्व दिया गया है, शुद्धि का अर्थ है आत्मा कि शुद्धि एवं विचारों की स्वच्छता तथा पवित्रीकरण से मन, बुद्धि तथा विचारों को शुद्ध किया जाता है | तथा इस पवित्रीकरण मंत्र से अपने आप तथा स्थान को पवित्र करके ही पूजन और शुभ कार्य आरम्भ करने से सभी तरह के कार्यों में सफलता मिलती है |

पवित्रीकरण का मंत्र इस प्रकार है:-

Mantra In Hindi:-

ऊँ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थांगतोऽपिवा |
यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं सः बाह्याभ्यन्तरः शुचिः ||

Mantra in English:-

Ohm Apvitra: Pavitro Va SarvavasthanGatoapivaa ||
Ya: Smaretpundrikaksham Sa: Bahyabhyantar: Shuchi: ||

इस मंत्र को पूजा स्थल तथा स्वयं पर जल छिडकते हुए बोलना चाहिए, और शुद्धि की कल्पना कर, आसन की शुद्धि करने के पश्चात पूर्व या उत्तर दिशा में मुख कर बैठना चाहिए, तत्पश्चात आचमन करना चाहिए एवं पूजन का संकल्प करना चाहिए | संकल्प करने से ही पूजनकर्ता को उसका फल मिलता है |

पूजन संकल्प विधि इस प्रकार है:- संकल्प विधि 

Wednesday, 27 November 2013

beejakshara mantra The Glory of God's Chanting

भगवान का स्मरण और स्मरण रूपी अमृत की महिमा 

भगवतस्मरण रुपी अमृत मानव के लिए कितना जरूरी है, इस विषय की चर्चा करने से पहले मैं यह बताना उचित समझाता हूँ की भगवत स्मरण-अमृत क्या है ?

आप के मन में विचार उठ रहे होंगे की इतनी सर्व साधारण बात को क्यों बताया जाता है, पर जरूरत बताने या समझाने की नहीं है, बल्कि उसको अपनाकर जीवन में उतरने की है | और भगवान का सतत संकीर्तन और नाम जप ही भागवत नाम अमृत कहलाता है | तथा  भगवान नाम के स्मरण व नित्य चिंतन करने से मनुष्य के सभी पापों का सर्वथा नाश हो जाता है | अत: कहा गया है कि:-

हरिर्हरति पापानि दुष्टचित्तेरपिस्मृत: |
अनिच्छयाऽपि संस्पृष्टो दहत्येव ही पावक: ||      

अर्थात:- जिस प्रकार अग्नि बिना इच्छा के स्पर्श करने पर भी जला देती है, उसी प्रकार भगवान नाम भी दुष्टजनों के द्वारा स्मरण करने पर उनके समस्त पापों को हर लेता है |
अत: इसी के सन्दर्भ में भगवन ने देवर्षि नारद को उपदेश देते हुए संकेत किया है-

नाहं वसामि वैकुंठे योगिनां हृदये न च |
मद्भक्ता यत्र गायन्ति तत्र तिष्ठामि नारद ! ||

अर्थात:- हे देवर्षि ! मैं न तो वैकुण्ठ में निवास करता हूँ और न ही योगीजनो के ह्रदय में मेरा निवास होता है | मैं तो उन भक्तों के पास सदैव रहता हूँ जहाँ मेरे भक्त मुझको चित्त से लीं और तन्मय होकर मुझको भजते है | और मेरे मधुर नामों का संकीर्तन करते है |

"स्कन्दपुराण" में इस भगवद वचन से श्री भगवन्नाम कि महिमा और भी स्पष्ट हो जाती है-

यन्नाऽस्ति कर्मजं लोके वाग्जं मानसमेव वा |
यन्न क्षपयते पापं कलौ गोविन्दकीर्तनम् ||

अर्थात:- मन, कर्म, वाणी से होने वाले जितने भी पाप होते है वह सभी पाप श्री गोविन्द नाम संकीर्तन से विलीन हो जाते है |

अत: भगवान श्री कृष्ण कहते है कि जो भक्त मुझको अनन्य भव से भजता है मैं उसके सभी पापों को हर लेता हूँ
और  उसे परम शांति प्रदान करता हूँ | यथा-

कृष्ण कृष्णेति कृष्णेति यो मां स्मृति नित्यशः |
जलं भित्वा यथा पद्यम् नरकादुद्धराम्यहम् ||

अर्थात:- जो भक्तजन मेरे कृष्ण नाम का नित्य संकीर्तन करते है उन भक्तों को मैं नरक से भी उसी तरह बाहर निकल देता हूँ जिस तरह से जल का भेदन कर कमल बाहर निकल आता है |

अत: भगवत प्रेमी भक्तों और श्रृद्धालुओं को चाहिए कि अपने स्वविवेक को समय रहते जाग्रत करे और भगवन्नाम कि महिमा को पहचानकर इस अनमोल अमृत को अपने जीवन में घोलकर इसका आनंद लेने से ही मुक्ति संभव है |

श्री कृष्णाय नमः 

Tuesday, 26 November 2013

beejakshara mantra Morning Mantras (Morning prayer Mantras)

!! करदर्शनम !!

प्रात: काल उठकर बिस्तर पर बैठकर अपने दोनों हाथों का अवलोकन इस श्लोक को बोलकर करना चाहिए !
  
In Hindi:-
 कराग्रे वसते लक्ष्मी: करमध्ये सरस्वती ! 
 करमूले तू गोविन्द: (ब्रह्मा:) प्रभाते कर दर्शनम !!

In English:-
                                                Kragre Vasate Lakshmi Karmadhye Saraswati |
                                                Karmule Tu Govind: (Brahma) Prabhate Kar Darshnam ||

भावार्थ:- हाथ के अगले भाग में लक्ष्मी, मध्य भाग में सरस्वती और मूल भाग में गोविन्द बसते है,इसलिए प्रात: काल उठते ही हाथों का दर्शन करना चाहिए ! ओर साथ ही अपने इष्ट देव का स्मरण करना चाहिए !

 !! पृथ्वीमाता  की वंदना और क्षमायाचना !! 

बिस्तर से जमीन पर पैर रखने से पहले इस श्लोक को बोलकर फिर पैर रखना चाहिए !

In Hindi:-
समुद्रवसने देवी ! पर्वतस्तनमण्डले ! 
 विष्णुपत्नी ! नमस्तुभ्यम पादस्पर्शम क्षमस्व में !!

In English:-

Samudravasane Devi | Paravatstanmandale |
Vishnupatni | Namstubhyam Padsparsham Kshamasva Me ||


 भावार्थ:- समुद्ररूपी वस्त्रोवाली, पर्वतरूपी स्तनवाली और विष्णु भगवान की पत्नी हे पृथ्वी देवी ! तुम्हे नमस्कार करता हूँ ! तुम्हे मेरे पैरों का स्पर्श होता है इसलिए क्षमायाचना करता हूँ !

 !! गुरु को नमस्कार !!

इन श्लोकों को बोलने के बाद अंत में अपने गुरुदेव का स्मरण करते हुए इस मंत्र को बोलना चाहिए |


In Hindi:-
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु: गुरुर्देवो महेश्वर: !
 गुरु: साक्षात्परम ब्रह्मा तस्मै श्रीगुरवे नम: !!

In English:-
GururBrahma GururVishnu: GururDevo Maheshvar: |
Guru: Sakshatparam Brahma Tasmai Shriguruve Namah: ||

Saturday, 23 November 2013

beejakshara mantra Manas Siddha Mantras (RancharitManas Ke Mantras)

Mantras to accomplishment of many purpose 

These are called as siddha mantras and you can use these for complete all the wishes.

श्री रामचरितमानस के  " मानस सिद्धि मंत्र "

गोस्वामी तुलसीदास जी कृत रामचरितमानस के अति प्रभावशाली मंत्र:-



**पालनीय नियम**

मानस के दोहे-चौपाईयों को सिद्ध करने का विधान यह है कि किसी भी शुभ दिन की रात्रि को दस बजे के बाद अष्टांग हवन के द्वारा मन्त्र सिद्ध करना चाहिये। फिर जिस कार्य के लिये मन्त्र-जप की आवश्यकता हो, उसके लिये नित्य जप करना चाहिये। वाराणसी में भगवान् शंकरजी ने मानस की चौपाइयों को मन्त्र-शक्ति प्रदान की है-इसलिये वाराणसी की ओर मुख करके शंकरजी को साक्षी बनाकर श्रद्धा से जप करना चाहिये।

**अष्टांग हवन सामग्री**

चन्दन का बुरादा, तिल, शुद्ध घी, चीनी, अगर, तगर, कपूर, शुद्ध केसर, नागरमोथा, पञ्चमेवा, जौ और चावल।

**विधान**

जिस उद्देश्य के लिये जो चौपाई, दोहा या सोरठा जप करना बताया गया है, उसको सिद्ध करने के लिये एक दिन हवन की सामग्री से उसके द्वारा (चौपाई, दोहा या सोरठा) 108 बार हवन करना चाहिये। यह हवन केवल एक दिन करना है। मामूली शुद्ध मिट्टी की वेदी बनाकर उस पर अग्नि रखकर उसमें आहुति दे देनी चाहिये। प्रत्येक आहुति में चौपाई आदि के अन्त में ‘स्वाहा’ बोल देना चाहिये।

प्रत्येक आहुति लगभग पौन तोले की (सब चीजें मिलाकर) होनी चाहिये। इस हिसाब से 108 आहुति के लिये एक सेर (80 तोला) सामग्री बना लेनी चाहिये। कोई चीज कम-ज्यादा हो तो कोई आपत्ति नहीं। पञ्चमेवा में पिश्ता, बादाम, किशमिश (द्राक्षा), अखरोट और काजू ले सकते हैं। इनमें से कोई चीज न मिले तो उसके बदले नौजा या मिश्री मिला सकते हैं। केसर शुद्ध 4 आने भर ही डालने से काम चल जायेगा।
हवन करते समय माला रखने की आवश्यकता 108 की संख्या गिनने के लिये है। बैठने के लिये आसन ऊन का या कुश का होना चाहिये। सूती कपड़े का हो तो वह धोया हुआ पवित्र होना चाहिये।

मन्त्र सिद्ध करने के लिये यदि लंकाकाण्ड की चौपाई या दोहा हो तो उसे शनिवार को हवन करके करना चाहिये। दूसरे काण्डों के चौपाई-दोहे किसी भी दिन हवन करके सिद्ध किये जा सकते हैं।
सिद्ध की हुई रक्षा-रेखा की चौपाई एक बार बोलकर जहाँ बैठे हों, वहाँ अपने आसन के चारों ओर चौकोर रेखा जल या कोयले से खींच लेनी चाहिये। फिर उस चौपाई को भी ऊपर लिखे अनुसार 108 आहुतियाँ देकर सिद्ध करना चाहिये। रक्षा-रेखा न भी खींची जाये तो भी आपत्ति नहीं है। दूसरे काम के लिये दूसरा मन्त्र सिद्ध करना हो तो उसके लिये अलग हवन करके करना होगा।

एक दिन हवन करने से वह मन्त्र सिद्ध हो गया। इसके बाद जब तक कार्य सफल न हो, तब तक उस मन्त्र (चौपाई, दोहा) आदि का प्रतिदिन कम-से-कम 108 बार प्रातःकाल या रात्रि को, जब सुविधा हो, जप करते रहना चाहिये।
कोई दो-तीन कार्यों के लिये दो-तीन चौपाइयों का अनुष्ठान एक साथ करना चाहें तो कर सकते हैं। पर उन चौपाइयों को पहले अलग-अलग हवन करके सिद्ध कर लेना चाहिये।

1. विपत्ति-नाश के लिये

“राजिव नयन धरें धनु सायक। भगत बिपति भंजन सुखदायक।।”

2॰ संकट-नाश के लिये

“जौं प्रभु दीन दयालु कहावा। आरति हरन बेद जसु गावा।।
जपहिं नामु जन आरत भारी। मिटहिं कुसंकट होहिं सुखारी।।
दीन दयाल बिरिदु संभारी। हरहु नाथ मम संकट भारी।।”

3॰ कठिन क्लेश नाश के लिये

“हरन कठिन कलि कलुष कलेसू। महामोह निसि दलन दिनेसू॥”

4॰ विघ्न शांति के लिये

“सकल विघ्न व्यापहिं नहिं तेही। राम सुकृपाँ बिलोकहिं जेही॥”

5॰ खेद नाश के लिये

“जब तें राम ब्याहि घर आए। नित नव मंगल मोद बधाए॥”

6॰ चिन्ता की समाप्ति के लिये

“जय रघुवंश बनज बन भानू। गहन दनुज कुल दहन कृशानू॥”

7॰ विविध रोगों तथा उपद्रवों की शान्ति के लिये

“दैहिक दैविक भौतिक तापा।राम राज काहूहिं नहि ब्यापा॥”

8॰ मस्तिष्क की पीड़ा दूर करने के लिये

“हनूमान अंगद रन गाजे। हाँक सुनत रजनीचर भाजे।।”

9॰ विष नाश के लिये

“नाम प्रभाउ जान सिव नीको। कालकूट फलु दीन्ह अमी को।।”

10॰ अकाल मृत्यु निवारण के लिये

“नाम पाहरु दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट।
लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहि बाट।।”

11. सभी तरह की आपत्ति के विनाश के लिये / भूत भगाने के लिये

“प्रनवउँ पवन कुमार,खल बन पावक ग्यान घन।
जासु ह्रदयँ आगार, बसहिं राम सर चाप धर॥”

12. नजर झाड़ने के लिये

“स्याम गौर सुंदर दोउ जोरी। निरखहिं छबि जननीं तृन तोरी।।”

13॰ खोयी हुई वस्तु पुनः प्राप्त करने के लिए

“गई बहोर गरीब नेवाजू। सरल सबल साहिब रघुराजू।।”

14॰ जीविका प्राप्ति केलिये

“बिस्व भरण पोषन कर जोई। ताकर नाम भरत जस होई।।”

15॰ दरिद्रता मिटाने के लिये

“अतिथि पूज्य प्रियतम पुरारि के। कामद धन दारिद दवारि के।।”

16॰ लक्ष्मी प्राप्ति के लिये

“जिमि सरिता सागर महुँ जाही। जद्यपि ताहि कामना नाहीं।।
तिमि सुख संपति बिनहिं बोलाएँ। धरमसील पहिं जाहिं सुभाएँ।।”

17॰ पुत्र प्राप्ति के लिये

“प्रेम मगन कौसल्या निसिदिन जात न जान।
सुत सनेह बस माता बालचरित कर गान।।’

18॰ सम्पत्ति की प्राप्ति के लिये

“जे सकाम नर सुनहि जे गावहि।सुख संपत्ति नाना विधि पावहि।।”

19॰ ऋद्धि-सिद्धि प्राप्त करने के लिये

“साधक नाम जपहिं लय लाएँ। होहिं सिद्ध अनिमादिक पाएँ।।”

20॰ सर्व-सुख-प्राप्ति के लिये

सुनहिं बिमुक्त बिरत अरु बिषई। लहहिं भगति गति संपति नई।।

21॰ मनोरथ-सिद्धि के लिये

“भव भेषज रघुनाथ जसु सुनहिं जे नर अरु नारि।
तिन्ह कर सकल मनोरथ सिद्ध करहिं त्रिसिरारि।।”

22॰ कुशल-क्षेम के लिये

“भुवन चारिदस भरा उछाहू। जनकसुता रघुबीर बिआहू।।”

23॰ मुकदमा जीतने के लिये

“पवन तनय बल पवन समाना। बुधि बिबेक बिग्यान निधाना।।”

24॰ शत्रु के सामने जाने के लिये

“कर सारंग साजि कटि भाथा। अरिदल दलन चले रघुनाथा॥”

25॰ शत्रु को मित्र बनाने के लिये

“गरल सुधा रिपु करहिं मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई।।”

26॰ शत्रुतानाश के लिये

“बयरु न कर काहू सन कोई। राम प्रताप विषमता खोई॥”

27॰ वार्तालाप में सफ़लता के लिये

“तेहि अवसर सुनि सिव धनु भंगा। आयउ भृगुकुल कमल पतंगा॥”

28॰ विवाह के लिये

“तब जनक पाइ वशिष्ठ आयसु ब्याह साजि सँवारि कै।
मांडवी श्रुतकीरति उरमिला, कुँअरि लई हँकारि कै॥”

29॰ यात्रा सफ़ल होने के लिये

“प्रबिसि नगर कीजै सब काजा। ह्रदयँ राखि कोसलपुर राजा॥”

30॰ परीक्षा / शिक्षा की सफ़लता के लिये

“जेहि पर कृपा करहिं जनु जानी। कबि उर अजिर नचावहिं बानी॥
मोरि सुधारिहि सो सब भाँती। जासु कृपा नहिं कृपाँ अघाती॥”

31॰ आकर्षण के लिये

“जेहि कें जेहि पर सत्य सनेहू। सो तेहि मिलइ न कछु संदेहू॥”

32॰ स्नान से पुण्य-लाभ के लिये

“सुनि समुझहिं जन मुदित मन मज्जहिं अति अनुराग।
लहहिं चारि फल अछत तनु साधु समाज प्रयाग।।”

33॰ निन्दा की निवृत्ति के लिये

“राम कृपाँ अवरेब सुधारी। बिबुध धारि भइ गुनद गोहारी।।

34॰ विद्या प्राप्ति के लिये

गुरु गृहँ गए पढ़न रघुराई। अलप काल विद्या सब आई॥

35॰ उत्सव होने के लिये

“सिय रघुबीर बिबाहु जे सप्रेम गावहिं सुनहिं।
तिन्ह कहुँ सदा उछाहु मंगलायतन राम जसु।।”

36॰ यज्ञोपवीत धारण करके उसे सुरक्षित रखने के लिये

“जुगुति बेधि पुनि पोहिअहिं रामचरित बर ताग।
पहिरहिं सज्जन बिमल उर सोभा अति अनुराग।।”

37॰ प्रेम बढाने के लिये

सब नर करहिं परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती॥

38॰ कातर की रक्षा के लिये

“मोरें हित हरि सम नहिं कोऊ। एहिं अवसर सहाय सोइ होऊ।।”

39॰ भगवत्स्मरण करते हुए आराम से मरने के लिये

रामचरन दृढ प्रीति करि बालि कीन्ह तनु त्याग ।
सुमन माल जिमि कंठ तें गिरत न जानइ नाग ॥

40॰ विचार शुद्ध करने के लिये

“ताके जुग पद कमल मनाउँ। जासु कृपाँ निरमल मति पावउँ।।”

41॰ संशय-निवृत्ति के लिये

“राम कथा सुंदर करतारी। संसय बिहग उड़ावनिहारी।।”

42॰ ईश्वर से अपराध क्षमा कराने के लिये

” अनुचित बहुत कहेउँ अग्याता। छमहु छमा मंदिर दोउ भ्राता।।”

43॰ विरक्ति के लिये

“भरत चरित करि नेमु तुलसी जे सादर सुनहिं।
सीय राम पद प्रेमु अवसि होइ भव रस बिरति।।”

44॰ ज्ञान-प्राप्ति के लिये

“छिति जल पावक गगन समीरा। पंच रचित अति अधम सरीरा।।”

45॰ भक्ति की प्राप्ति के लिये

“भगत कल्पतरु प्रनत हित कृपासिंधु सुखधाम।
सोइ निज भगति मोहि प्रभु देहु दया करि राम।।”

46॰ श्रीहनुमान् जी को प्रसन्न करने के लिये

“सुमिरि पवनसुत पावन नामू। अपनें बस करि राखे रामू।।”

47॰ मोक्ष-प्राप्ति के लिये

“सत्यसंध छाँड़े सर लच्छा। काल सर्प जनु चले सपच्छा।।”

48॰ श्री सीताराम के दर्शन के लिये

“नील सरोरुह नील मनि नील नीलधर श्याम ।
लाजहि तन सोभा निरखि कोटि कोटि सत काम ॥”

49॰ श्रीजानकीजी के दर्शन के लिये

“जनकसुता जगजननि जानकी। अतिसय प्रिय करुनानिधान की।।”

50॰ श्रीरामचन्द्रजी को वश में करने के लिये

“केहरि कटि पट पीतधर सुषमा सील निधान।
देखि भानुकुल भूषनहि बिसरा सखिन्ह अपान।।”

51॰ सहज स्वरुप दर्शन के लिये

“भगत बछल प्रभु कृपा निधाना। बिस्वबास प्रगटे भगवाना।।”

(आभार:- कल्याण )

Friday, 22 November 2013

beejakshara mantra Significance Of God Worship & Satsang

सत्संग और प्रार्थना की महिमा तथा महत्व 

In Hindi:-
बिनु सत्संग विवेक न होई |
राम कृपा बिनु सुलभ न सोई ||

In English:-
Binu Satsang Vivek Na Hoi |
Rama Kripa Binu Sulabh Na Soi ||

इस मंत्र में श्री राम की महिमा का गुणगान किया गया है, और तुलसीदास जी ने श्री राम प्रभु के सत्संग का चित्रण किया है कि बिना सतसंग किये विवेक अर्थात ज्ञान नहीं होता है और सत्संग नहीं करने से राम कृपा भी नहीं होगी जिससे आप सुलभता अर्थात सरलता से सो नहीं सकते, यहाँ तुलसीदास जी ने सोने का तात्पर्य मोक्ष प्राप्ति से लिया है तथा सुलभ न सोई अर्थात आप सुलभता से नहीं मर सकते और अगर राम का नाम नहीं लिया तो जीवन में बहुत कष्ट उठाने पड़ते है और जीवन मृत्यु के सामान हो जाता है |

अत: प्रत्येक मनुष्य को भगवान का भजन और कीर्तन करना चाहिए जिससे उसका प्रारब्ध सुधरे और जीवन में सुख और शांति बनी रहे |

Tuesday, 19 November 2013

beejakshara mantra Mantra to Getting True Devotion of God

भगवान की भक्ति प्राप्त करने हेतु मंत्र

This mantra’s from kishkindha kand of Ramcharitmanas and by chanting this mantra, you will getting success everywhere in life.

In Hindi:-

अब प्रभु कृपा करहूँ एहिं भांती |
सब तजि भजन करहूँ दिन राती ||

In English:-

Ab Prabhu Kripa Karahun Eahin Bhanti |
Sab Taji Bhajan Karahu Din Raati ||

यह मंत्र (चौपाई) गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित रामचरितमानस के किष्किंधाकांड से ली गई है, इसमें भगवान से भक्त ने कहा है कि- हे प्रभु अगर कृपा करनी है तो ऐसी कीजिये कि मैं सब कुछ छोडकर दिन-रात केवल आपका ही भजन (स्मरण) करता रहूँ |

अत: इस मंत्र का जाप करने से आपको प्रभु कि भक्ति प्राप्त होगी और इस मंत्र का प्रतिदिन स्मरण करने से प्रभु श्रीरामचंद्र कि कृपा होती है, तथा सुख व समृद्धि कि वृद्धि होती है |

Sunday, 17 November 2013

beejakshara mantra How to get Peace and Happiness in Life

!! विवेक चतुष्टय !!

नास्ति विद्या सम चाशुर्नास्ती सत्य समं तप: |
नास्ति राग समं दुह्खं नास्ति त्याग समं सुखम ||

इस निखिल विश्व में विद्या के समान दिव्य नेत्र नहीं है ,सत्य के समान किसी प्रकार का तप नही है क्रोध के समान कोई दुःख नही है और नही है त्याग के समान कोई परम सुख |

वस्तुत: विधा की उपलब्धि से मानव ज्ञान पुंज का संचय कर सत्कर्म में अभिरत हो परमात्म सुख की अनुभूति करता है| “ विद्यया अमृतमश्नुते ” यह उपनिषद का महा वाक्य इसी का प्रतिपादन करता है इसी प्रकार सत्य पालन से प्राणी सत्य स्वरूप भगवान श्री सर्वेश्वर के अनिर्वचनीय दर्शन कर अपरिमित आनंद सुधारस का पान कर परम तृप्त होता है | “सत्यं वद” | यह वेद का उद्गोष इसलिय पुनः संसार को सचेत एवं सावधान करता है |

क्रोध प्राणी मात्र का सबसे बड़ा शत्रु है ,इससे सभी विवेकहीन होकर अकरणीय अत्यंत नीच कर्म के करने में भी नही हिचकिचाते |इसी से तो श्रीमद्भगवद्गीता में सर्वनियन्ता भगवान सर्वेश्वर श्री श्यामसुन्दर ने अर्जुन को उपदेश करते हुये आज्ञा दी है |

क्रोधाद्भ्वती संमोह संमोहा त्स्मृति विभ्रम :|
स्मृति भ्रंशाद बुद्धि नाशो बोद्धि नशात्प्रण श्यति ||
(भगवद्गीता श्लोक)

अर्थात क्रोध से मोह की उत्पति और मोह से बुद्धि का हास और बुद्धि के ह्रास से प्राणी विनाश को प्राप्त हो जाता है

अत: मानव के तीन शत्रु दिखते नहीं है, परन्तु बहुत शक्तिशाली होते है, इनको परित्याग करके ही मानव अपना कल्याण करता है |

अहंकारं बलं दर्प कामं क्रोधो परिग्रहम् |
विमुच्य निर्मम शान्तो ब्रह्म भुयाय कल्पते ||
(भगवद्गीता श्लोक)

यह मार्मिक उपदेश कर स्पष्ट ही संकेत किया है कि अहंकार , बल, दर्प, घमंड ,काम, [सांसारिक इच्छाएँ] क्रोध और परिग्रह [संग्रह का त्याग ] करने पर प्राणी अनासक्त शांत होकर परब्रह्म परमात्मा श्री कृष्ण को प्राप्त कर सकता है अतः यह महाभारत का विवेक चतुष्टय परम कल्याणकारी और नितांत आवश्यक है इसका मनन करने से इन आंतरिक शत्रु पर विजय प्राप्त कर संतोष सुख को प्राप्तकरता है, इसी में हित सन्निहित है |

Saturday, 16 November 2013

beejakshara mantra Mantra for Love and Devotion

 प्रेम बढाने के लिये 

Lord Ram With Sita
In Hindi:-
            
सब नर करहिं परस्पर प्रीती। 
चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती॥


In English:- 

Sab Nar Karahin Paraspar Priti |
Chalahin Svadharma Nirat Shruti Niti ||


उपयोग:- यह मंत्र रामचरितमानस से लिया गया है, प्रभु श्री राम का ध्यान करते हुए कोई याचक  इस मंत्र का नित्य जाप करता है तो यह  बहुत प्रभावकारी सिद्ध होता है |

Wednesday, 13 November 2013

beejakshara mantra Shree Krishna Stuti ( In Sanskrit )


गोपाल कृष्ण मंत्र (श्रीकृष्ण स्तुति)

भगवान श्री कृष्ण की स्तुति और आराधना से सारे पाप धुल जाते है और सभी प्रकार के सुखों की प्राप्ति होती है तथा इस बात को सिद्ध करने हेतु प्रमाण देने की आवश्यकता नहीं है कि प्रभु सबकुछ करने में सक्षम है |

भगवान कृष्ण की इस स्तुति को संध्याकाल में श्रीद्धाभाव से कारण चाहिए और आपने जीवन को आनन्दित बनाना चाहिए |


In Hindi:-

कस्तुरी तिलकं ललाटपटले वक्षःस्थले कौस्तुभं
नासाग्रे वरमौक्तिकं करतले वेणु करे कङ्कणम् |
सर्वाङ्गे हरिचन्दनं सुललितं कंठे च मुक्तावली:
गोपस्त्रिपरिवेष्टितो विजयते गोपालचूडामणि: ||

In English:-                  

                                            Kasturi Tilakam Lalatpatle Vakshsthale Koustubham
                                            Nasagre Varmouktikam Kartale Venu Kare Kankanam |
                                            Sarvange Harichandanam Sulalitam Kanthe Cha Muktavali:
                                             Gopstripariveshtito Vijayate GopalChudamani: ||

भावार्थ:-जिनके सिर पर कस्तूर का तिलक हो, और वक्ष स्थल पर कौस्तुभमणि हो, नाक के अग्र भाग में उत्तम मोती हो, हाथ में मुरली हो व हाथों में कंगन धारण किये हुए हो | सारे शरीर पर सुगंधित चन्दन का लेप करने वाले, और गले में मोतियों कि माला हो, जिन पर गोपियाँ लिपटी हुयी हो, गोपालों में श्रेष्ठ ऐसे श्रीकृष्ण कि सर्वदा विजय हो |

मंत्र उपयोग:-यह मंत्र भगवान श्रीकृष्ण की वंदना या स्तुति करने के लिए प्रयोग में लिया जाता है | इसका स्मरण प्रत्येक दिन सुबह या शाम संध्याकाल में करना फलदायी रहता है | और इस मंत्र के नित्य प्रयोग से घर में शांति बनी रहती है, व पारिवारिक क्लेशो से छुटकारा प्राप्त होता है ऐसा शास्त्रों में विदित है |
                                  (जय श्रीकृष्ण)

Thursday, 7 November 2013

beejakshara mantra Tulsi Mahatmya ( How useful The Ocimum tenuiflorum )

तुलसी महात्म्य ( तुलसी महत्व धार्मिक दृष्टि से )

Tulsi
तुलसी भगवान की एक अद्भुद देन है और तुलसी धार्मिक एवं आयुर्वेद दोनों ही दृष्टियों से महत्वपूर्ण है | मंदिरों आदि में तो भगवान श्रीहरि के पूजन की वस्तुओ में तुलसी का विशेष स्थान है, और तो और तुलसी के बिना भगवान अपनी पूजा अर्चना व भोग और नैवेद्य भी स्वीकार नहीं करते |

 शिला ताम्रं तथा तोयं शंखः पुरुषसूक्तकम् | 
गन्धं घंटा तथा तुलसीत्यष्टाङ्गं तीर्थमुच्यते || 

उपर्युक्त हलायुद्ध ग्रन्थ के प्रमाणानुसार देवतीर्थ के आठ पदार्थों में तुलसी का होना परम आवश्यक है | बिना तुलसी के देवतीर्थ भी अपूर्ण है |



वैष्णव व सनातन जनों का यह विश्वास है कि अंतिम समय में जिस व्यक्ति को भगवान का चरणामृत और उनको अर्पण किया हुआ तुलसी दल प्राप्त हो जाता है तो वह जन्म मरण के बंधन से छूट जाता है व मोक्ष को प्राप्त हो जाता है, विष्णु पुराण में तो यहाँ तक कहा गया है कि यदि किसी मनुष्य या प्राणी ने आजीवन पाप व निंदनीय कर्म किये हो व अंत समय में श्रीहरि का स्मरण करते हुए तुलसी दल या चरणामृत का सेवन कर लेता है तो उसे यमदूत छू तक नही सकते और उसे वैकुण्ठ लोक कि प्राप्ति होती है |

जिसने तुलसी कि मंजरी से भगवान विष्णु का पूजन किया हो, उसने अपने जन्म भर के समस्त पापों को नष्ट कर दिया | और अपने मुक्ति के द्वार खोल दिए, ऐसा विष्णुपुराण का मत है |

 तुलसी कि महिमा तो अपरम्पार है, तुलसी का पौधा घर में हो तो उस घर में कभी भी पाप नही हो सकता है तथा स्वयं यम व यम के दूत भी वहाँ नही आ सकते है | ऐसी गुणदायिनी, कृष्णप्रिया, विष्णुप्रिया, सर्वपापहारिणी माता तुलसी को मै प्रणाम करता हूँ |

Friday, 1 November 2013

beejakshara mantra Hare Krishna Maha Mantra

!! हरे कृष्ण महामंत्र  !!

In Hindi:-
हरे  कृष्ण हरे  कृष्ण,  कृष्ण कृष्ण हरे हरे  !
                    हरे  राम हरे  राम, राम  राम  हरे  हरे  !!

In English:-

  Hare Krishna Hare Krishna, Krishna Krishna Hare Hare !
                                Hare Ram Hare Ram, Ram Ram Hare Hare !!

यह मंत्र कोई साधारण मंत्र नहीं है, इस मंत्र को वेद, पुराणों व शास्त्रों में महामंत्र कहा गया है ! इस मंत्र का नित्य जाप करने वालों को उनके जीवन में किसी भी प्रकार की बाधा नही आ सकती है, ऐसा शास्त्रों में विदित है !

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