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Tuesday, 26 November 2013

beejakshara mantra Morning Mantras (Morning prayer Mantras)

!! करदर्शनम !!

प्रात: काल उठकर बिस्तर पर बैठकर अपने दोनों हाथों का अवलोकन इस श्लोक को बोलकर करना चाहिए !
  
In Hindi:-
 कराग्रे वसते लक्ष्मी: करमध्ये सरस्वती ! 
 करमूले तू गोविन्द: (ब्रह्मा:) प्रभाते कर दर्शनम !!

In English:-
                                                Kragre Vasate Lakshmi Karmadhye Saraswati |
                                                Karmule Tu Govind: (Brahma) Prabhate Kar Darshnam ||

भावार्थ:- हाथ के अगले भाग में लक्ष्मी, मध्य भाग में सरस्वती और मूल भाग में गोविन्द बसते है,इसलिए प्रात: काल उठते ही हाथों का दर्शन करना चाहिए ! ओर साथ ही अपने इष्ट देव का स्मरण करना चाहिए !

 !! पृथ्वीमाता  की वंदना और क्षमायाचना !! 

बिस्तर से जमीन पर पैर रखने से पहले इस श्लोक को बोलकर फिर पैर रखना चाहिए !

In Hindi:-
समुद्रवसने देवी ! पर्वतस्तनमण्डले ! 
 विष्णुपत्नी ! नमस्तुभ्यम पादस्पर्शम क्षमस्व में !!

In English:-

Samudravasane Devi | Paravatstanmandale |
Vishnupatni | Namstubhyam Padsparsham Kshamasva Me ||


 भावार्थ:- समुद्ररूपी वस्त्रोवाली, पर्वतरूपी स्तनवाली और विष्णु भगवान की पत्नी हे पृथ्वी देवी ! तुम्हे नमस्कार करता हूँ ! तुम्हे मेरे पैरों का स्पर्श होता है इसलिए क्षमायाचना करता हूँ !

 !! गुरु को नमस्कार !!

इन श्लोकों को बोलने के बाद अंत में अपने गुरुदेव का स्मरण करते हुए इस मंत्र को बोलना चाहिए |


In Hindi:-
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु: गुरुर्देवो महेश्वर: !
 गुरु: साक्षात्परम ब्रह्मा तस्मै श्रीगुरवे नम: !!

In English:-
GururBrahma GururVishnu: GururDevo Maheshvar: |
Guru: Sakshatparam Brahma Tasmai Shriguruve Namah: ||

Sunday, 24 November 2013

beejakshara mantra Mantra For Sun Salutations And Worship

सूर्य नमस्कार और स्तुति

वेदों और पुरानों में सूर्य देव को चराचर सृष्टि की आत्मा कहा गया है, समस्त ब्रह्माण्ड की आत्मा सूर्य ही है, पुराणों में सूर्यदेव को आदित्य, दिवाकर, भास्कर और तेजोमय आदि से भी संबोधित किया गया है | सूर्य देव की अनुपम कृपा से ही इस पृथ्वी पर जीवन है, और सृष्टि के तेज और प्रकाश को बनाये रखने में इनकी कृपा जगतविदित है | 

अत: प्रातकाल सूर्यदेव को नमस्कार कारण  चाहिए और आरोग्यमय जीवन देने हेतु प्रार्थना करनी चाहिए |

In Hindi:-

 आदिदेव ! नमस्तुभ्यम प्रसीद मम भास्कर !
 दिवाकर ! नमस्तुभ्यम प्रभाकर नमोस्तु ते !!

In English:-                        
                                                 Aadidev |  Namastubhyam Prasid Mam Bhaskar |
                                                 Divakar |  Namstubhyam Prabhakar Namostu Te ||

 भावार्थ:-  हे आदिदेव सूर्यनारायण ! में आपको नमस्कार करता हूँ ! प्रकाश देने वाले हे भास्कर, आप प्रसन्न हो ! हे तेजस्वी दिवाकर देव ! में आपको नमस्कार करता हूँ ! हे तेजोमय देव ! में आपको नमस्कार करता हूँ !

सूर्यनमस्कार का फल

In Hindi:-

आदित्यस्य नमस्कारम ये कुर्वन्ति दिने दिने ! 
 जन्मांतरसहस्त्रेषु दारिद्रयं नोपजायते !!

In English:-

Aaditsya Namaskarm Ye Kurvanti Dine Dine |
JanmantarSahastreshu Daridrayam Nopjayate ||

 भावार्थ:- जो मनुष्य सदैव सूर्यनमस्कार करते है, उन्हें हजारों जन्मो तक दरिद्रता नही आती है ! और वे हमेशा सुखी व प्रसन्न रहते है ।

Sunday, 10 November 2013

beejakshara mantra Mantras From Bhagavad-gita


(त्रिकाल संध्या) भोजन के समय बोले जाने वाले मंत्र

कर्मों की महिमा बताते हुए भगवान श्री कृष्ण अर्जुन से कहते है कि हे पार्थ ! तुम जो भी करते हो, जो भी खाते हो, जो भी बोलते हो और जो भी सोचते हो सब मुझको समर्पित कर दो | ऐसा करने से तुम सभी प्रकार से अच्छे कर्म के भागी बनोगे |

अत: मनुष्य को भगवद्गीता में भगवान के कहे वचनों का पालन कर सब कुछ प्रभु को सरेपित करते हुए जीवन जीना चाहिए | तथा अपने आप को उनकी कृपा का पात्र बनाना चाहिए |

मंत्र इस प्रकार हैं :-
यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः |
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ||
                            (गीता श्लोक)
In English:-                    

Yagyashishtashin: Santo Muchyante Sarvakilbishe: |
Bhunjate Te Tvagham Papa Ye Pachantyaatmakarnat ||



यत्करोषि यदन्श्रासि यज्जुहोषि ददासि यत् |
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ||
                        (गीता श्लोक)
In English:-
                                             Yatkaroshi Yadnshrashi Yajjuhoshi Dadaasi yat |
                                             Yattpasyasi Kontey Tatkurushva Madrpanam ||


अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः |
प्रानापानसमायुक्त: पचाम्यन्नं चतुर्विधम् ||
                        (गीता श्लोक)
In English:-
                                               Aham Veshvanro Bhutva Praninam Dehmashrit: |
                                               Pranapansmayuktam: Pchamyannam Chaturvidham ||

!! शांति प्रार्थना !!

ओम सहनाववतु सहनौभुनक्तु सहवीर्यं करवावहै |
तेजस्वी नाव धीतमस्तु मा कस्चिददुखभागभ्वेत ( मा विद्विषावहै ) ||

In English:-

                    Om Sahnavavtu Sahnobhunktu Sahviryam Karvavahe |
                       Tejsvi naav Dhitmastu Maa Kaschidadukhbhagbhavet ( Maa Vidvishaamhe ) ||

यह सभी श्लोक भगवदगीता से लिये गए है, और यह श्लोक भगवान श्रीकृष्ण के मुखारविंद से निकले हुए है, गीता में भगवान कहते है कि जो कोई भक्त यज्ञ, तप, और दानादि का अंश मुझमे अर्पित करना है वह भक्त मुझको अत्यंत प्रिय है और वह सब प्रकार के पापों से मुक्त होकर मुझको ही प्राप्त होता है |

और श्रीभगवन ने यह भी कहा है कि जो भी तुम करते हो, खाते हो, देते हो, सोचते हो उन सब का फल मुझे अर्पण करने से भवसागर से मुक्ति मिलती है और मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है |

अर्थात कहने का तात्पर्य यह है कि मनुष्य को चाहिए कि बड़ी मुश्किल से उसे जो यह मानव देह (मनुष्य देह) मिली है, उसे व्यर्थ न गवांकर भगवान कि शरण में अर्पित करनी चाहिए | गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी रामचरितमानस में इसका उल्लेख किया है:-

“ बड़े भाग मानस तनु पावा | सुर दुर्लभ सद ग्रंथन गावा ”

मंत्र उपयोग:-

इन मन्त्रों को भोजन करने से पहले बोलना श्रेष्ठ रहता है, और इन श्लोकों को बोलते समय भगवान श्री कृष्ण का स्मरण करते रहना चाहिए | जिससे कि मनुष्य का खाना पापियों को प्राप्त न होकर भगवान को अर्पित होता है | और श्री कृष्ण ने भी गीता में यही कहा है कि “अहं वैश्वानरो भूत्वा ” अर्थात में ही सब कुछ हूँ | में ही बीजमंत्र हूँ, और में ही सब प्राणियों कि आत्मा हूँ, में ही विश्व का संचालक हूँ, और में ही संहारकर्ता अर्थात सब मे मैं (परमात्मा) स्थित हूँ और सब मुझ में स्थित है |

(श्री कृष्ण)

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