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Wednesday, 20 November 2013

beejakshara mantra How To Get Job Quickly From Mantra

शीघ्रता से रोजगार प्राप्त करने का मंत्र
                                                                           
श्रीमद्भगवतगीता के दिव्य श्लोकों के अनुष्ठान से अद्भुत लाभ:-

विश्व का कोन ऐसा व्यक्ति है जो श्रीमद्भगवतगीता की अलौकिक दिव्य महिमा से अपरिचित हो | अखिल ब्रह्मांडाधिपिती सर्वनियन्ता सर्वेश्वर भगवान श्री कृष्ण स्वयं जिसका उपदेश करते हों | गीता के दिव्य श्लोको की दिव्य शक्ति उसमे समाहित है | किन्तु जगत के अधिकांश अर्थार्थी भक्तो का आधिक्य है | जो इस लोक में धन ऐश्वर्य प्राप्त करना चाहते है उनको गीता के इस श्लोक की उपासना करनी चाहिए | जिनके करने पर त्रिविध तापों व श्री, ओज, ऐश्वर्य आदि सुलभता से प्राप्त होते है |

In Hindi:-

    अनन्याश्चिन्तयन्तो माँ ये जना: पर्युपासते |
       तेषां नित्याभियुक्तानां योग अक्षेमं वहाम्यह्म ||

In English:-

  Ananyashchintyanto Mam Ye Jana: Paryupasate |
      Tesham Nityabhiyuktanam Yogakshemam Vahamyaham ||

उक्त श्लोक का नित्य (प्रात: सांय ) संध्या समय 21 या 31 बार पाठ करने से सभी मनोरथ पूरे होकर, अभीष्ट की प्राप्ति होती है| पाठ करते समय घी का दीपक जला दे और श्रीकृष्णस्वरूप सामने रखे इससे ध्यान लगाने में सुगमता रहती है |

You will gets a job quickly from this mantra but have to jaap regularly at morning and evening with believe in the god power.

(जय श्रीकृष्ण) 

Sunday, 17 November 2013

beejakshara mantra How to get Peace and Happiness in Life

!! विवेक चतुष्टय !!

नास्ति विद्या सम चाशुर्नास्ती सत्य समं तप: |
नास्ति राग समं दुह्खं नास्ति त्याग समं सुखम ||

इस निखिल विश्व में विद्या के समान दिव्य नेत्र नहीं है ,सत्य के समान किसी प्रकार का तप नही है क्रोध के समान कोई दुःख नही है और नही है त्याग के समान कोई परम सुख |

वस्तुत: विधा की उपलब्धि से मानव ज्ञान पुंज का संचय कर सत्कर्म में अभिरत हो परमात्म सुख की अनुभूति करता है| “ विद्यया अमृतमश्नुते ” यह उपनिषद का महा वाक्य इसी का प्रतिपादन करता है इसी प्रकार सत्य पालन से प्राणी सत्य स्वरूप भगवान श्री सर्वेश्वर के अनिर्वचनीय दर्शन कर अपरिमित आनंद सुधारस का पान कर परम तृप्त होता है | “सत्यं वद” | यह वेद का उद्गोष इसलिय पुनः संसार को सचेत एवं सावधान करता है |

क्रोध प्राणी मात्र का सबसे बड़ा शत्रु है ,इससे सभी विवेकहीन होकर अकरणीय अत्यंत नीच कर्म के करने में भी नही हिचकिचाते |इसी से तो श्रीमद्भगवद्गीता में सर्वनियन्ता भगवान सर्वेश्वर श्री श्यामसुन्दर ने अर्जुन को उपदेश करते हुये आज्ञा दी है |

क्रोधाद्भ्वती संमोह संमोहा त्स्मृति विभ्रम :|
स्मृति भ्रंशाद बुद्धि नाशो बोद्धि नशात्प्रण श्यति ||
(भगवद्गीता श्लोक)

अर्थात क्रोध से मोह की उत्पति और मोह से बुद्धि का हास और बुद्धि के ह्रास से प्राणी विनाश को प्राप्त हो जाता है

अत: मानव के तीन शत्रु दिखते नहीं है, परन्तु बहुत शक्तिशाली होते है, इनको परित्याग करके ही मानव अपना कल्याण करता है |

अहंकारं बलं दर्प कामं क्रोधो परिग्रहम् |
विमुच्य निर्मम शान्तो ब्रह्म भुयाय कल्पते ||
(भगवद्गीता श्लोक)

यह मार्मिक उपदेश कर स्पष्ट ही संकेत किया है कि अहंकार , बल, दर्प, घमंड ,काम, [सांसारिक इच्छाएँ] क्रोध और परिग्रह [संग्रह का त्याग ] करने पर प्राणी अनासक्त शांत होकर परब्रह्म परमात्मा श्री कृष्ण को प्राप्त कर सकता है अतः यह महाभारत का विवेक चतुष्टय परम कल्याणकारी और नितांत आवश्यक है इसका मनन करने से इन आंतरिक शत्रु पर विजय प्राप्त कर संतोष सुख को प्राप्तकरता है, इसी में हित सन्निहित है |

beejakshara mantra Incarnation Of God And Philosophy Of Lord Avatar

भगवान का अवतार (अवतरण) कब और क्यों होता है ?

Avatars of  God
भगवान का अवतार कब और क्यों होता है, इस तथ्य को जानने के लिए सबसे पहले ये जानना अतिआवश्यक है की अवतार क्या है ?


अवतार:- भगवान समय-समय पर पृथ्वी पर अवतरित होते है, और पृथ्वी पर भगवान का मानव रूप में अवतरित होना ही अवतार कहलाता है, हमारे वेदों व शास्त्रों में अवतार होने के कई व्याख्यान देखने को मिलते है, कई बार भगवान को भी विधि का विधान भोगने के लिए पृथ्वी (मृत्युलोक) पर अवतरित होना पडता है, अंतत: भगवान का मृत्युलोक में अवतरण ही अवतार कहलाता है |




अवतार कब व क्यों होता है ?

अब हमारे मन में यह प्रश्न उठता है की भगवान क्यों अवतरित होते है और कब अवतरित होते है, और भगवान के अवतार का इस पृथ्वी लोक से क्या वास्ता है | इसका सीधा सा कारण(उत्तर) यह है की भगवान ने जब सृष्टि की रचना की थी तभी उन्होंने लोकों और कालचक्र का निर्धारण कर दिया था | भगवान ने मनुष्यों, साधकों(साधुओं) और अन्य जीवों को मृत्युलोक अर्थात पृथ्वी लोक, असुरों को पाताल लोक, और इसी तरह देवताओं को स्वर्ग लोक में विभाजित कर दिया | पर असुरों ने अपने तप और बल से बारम्बार पृथ्वी पर रहने वाले जीवों और साधुओं को प्रताड़ित करना शुरू कर दिया तब भगवन अवतरित होकर उनका विनाश करने लगे | ये कई दृष्टान्त शाश्त्रों में विस्तार से दिए गए है, हम फिर से उसी पश्न पर लौटेंगे की अवतार कब व क्यों होता है |

भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत के युद्ध के समय (श्रीमद्भगवद्गीता में) अर्जुन को दिव्य ज्ञान का उपदेश देते हुए कहा था कि:-

 अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन | 
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया ||
 (भगवद्गीता चतुर्थोध्याय श्लोक ६ ) 

 अर्थात:- यद्यपि में अजन्मा तथा अविनाशी हूँ, और यद्यपि में समस्त जीवों का स्वामी हूँ, तो भी में प्रत्येक युग में अपने आदि दिव्य रूप में प्रकट होता हूँ |

 यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति: भारत: | 
 अभ्युत्थानम अधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम || 
 (भगवद्गीता चतुर्थोध्याय श्लोक ७ )

 अर्थात:- जब जब धर्म का ह्वास या हानि (पतन) होता है, और हे भारतवंशी अधर्म की प्रधानता होने लगती है, अर्थात मनुष्य जाति पीड़ित होकर त्राहि त्राहि करने लग जाती है, तब में धर्मं की रक्षा व उसके पुनरुत्थान के लिए अवतरित होता हूँ | अर्थात अवतार लेता हूँ |

 परित्राणाय च साधुनाम विनाशाय च दुष्कृताम |
 धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे || 
 (भगवद्गीता चतुर्थोध्याय श्लोक ८ ) 

 अर्थात:- भक्तों (साधुओं) का उद्धार करने, और दुष्टों (जो अधर्म के मार्ग पर चलते है) का विनाश करने तथा धर्मं की फिर से स्थापना करने के लिए मैं हर युग में प्रकट होता हूँ |

 अर्थात भगवान अपने प्रिय भक्तों कि पीड़ा को हरने व उनका उद्धार करने के लिए हर युग में अवतरित (अवतार) होते है, और प्रत्येक मनुष्य को उन अविनाशी भगवान का सदैव चिंतन व स्मरण करते रहना चाहिए |

(जय श्रीकृष्ण )

Friday, 15 November 2013

beejakshara mantra Universal Truth & What's Karma ?

Karma and effects of karma

Reactions of Karma
हमारे शास्त्रों और पुरानों में कर्म का बड़ा महत्व है, यथा मनुष्य और सभी जीवों के लिए कर्म का एक सामान महत्व है | इसके अनुसार प्राणी अपने जीवनकाल में जो कुछ भी करते है वह कर्म के अंतर्गत आता है, चाहे वह अच्छा कार्य और या बुरा सभी को कर्म में सम्मिलित किया जाता है | तथा इसी कर्म के अनुसार प्राणियों को सुख और दुखों का भोग कारण पडता है |

कर्म की महिमा आदि से लेकर अनंत तक एक समान ही देखने को मिलती है, इसमें प्राणीमात्र के जीवन से लेकर मृत्यु तक के कर्मों का उल्लेख होता है | भगवद्गीता में भगवान कृष्ण ने कर्म को महान बतलाते हुए कहा है कि मनुष्यों को कर्म करने से पहले चिंतन अवश्य करना चाहिए कि जो कर्म करने जा रहे है वो उचित है या नहीं, क्योंकि जैसा कर्म हम करते है, वैसा ही फल हमें भोगना पडता है |

और यह भी सच्चाई है कि मनुष्य का पुनर्जन्म भी कर्मों के आधार पर ही होता है | अत: मनुष्य को चाहिए कि जो हुआ उसे भूलकर अच्छे कर्मों को कारण आरम्भ करें, और मन को प्रभु परम में लगाये और अपने जीवन को धन्य बनायें |

रामचरितमानस और भगवद्गीता में कर्म को इस प्रकार परिभाषित किया गया है :-


(1)चौपाई:-

काहु न कोउ सुख दुःख कर दाता |
                     निज कृत करम भोग सबु भ्राता ||

भावार्थ:- महाकवि तुलसीदास जी द्वारा रचित रामचरित मानस के अयोध्या कांड में श्री लक्ष्मणजी निषादराज से कहते है कि - हे भाई ! कोई किसी को सुख दुःख देने वाला नहीं है, सभी लोग अपने किये हुए कर्मों का फल भोगते है ! अर्थात जैसी करनी वैसी भरनी !

(2)चौपाई :-

कर्म  प्रधान   विश्व  करि  राखा |
                         जो जस करहि सो तस फलु चाखा ||

भावार्थ:- अर्थात इस संसार में कर्म ही प्रधान है, जो जैसा करता है वैसा ही फल पाता है |
               "जैसी करनी वैसा फल, आज नहीं तो निश्चय कल !"

भगवद्गीता श्लोक :-
           
          यादृशं  कुरुते कर्म,  तादृशं फलमश्नुते |
      और 
             अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभं |

भावार्थ:- गीता में भगवान कृष्ण कहते है कि मनुष्य जैसा कर्म करता है, वैसा ही फल पाता है !और मनुष्य  को उसके अच्छे और बुरे कर्मो के फल अवश्य ही भोगने पड़ते है |

इसलिए कहावत है कि "बोया पेड़ बबूल का, आम कहा ते खाय " |

अत: मनुष्य को चाहिए कि वह अपने जीवन में उचित कर्म करें, क्योकि सभी जीवों में मनुष्य ही एकमात्र प्राणी है जो सोचने और समझाने की क्षमता रखता है |

Thursday, 14 November 2013

beejakshara mantra Mantra for Freedom From Phantom Spirits and Peace

गृह शांति और मृत अथवा प्रेत आत्माओं से मुक्ति के लिए 

गृह शांति और प्रेतात्माओं से मुक्ति केवल प्रभु (परमात्मा) कि कृपा से ही संभव है, क्योकि वह परमपिता परमेश्वर है और सब कुछ जो भी घटित हो रहा होता है या होने वाला होता है वह प्रभु कि ही लीला है | अत: इस परेशानी का हल भी प्रभु के पास ही होता है | 


साधारणतया: कलियुग में हनुमान जी को अग्रणी देवता के रूप में पूजा जाता है और इस युग में प्रभु के वे एकमात्र भक्त है जो हमें कलियुग के मायाजाल से बचाते है, इसलिए अगर किसी को प्रेतात्माओं का भय सता रहा हो या प्रेत आत्माओं कि मुक्ति का उपाय करना हो तो हनुमान जी का स्मरण करना चाहिए |

अथवा हनुमान जी कि प्रतिमा को प्रतिष्ठित कर, आसान पर विराजित होकर पूर्वाभिमुख हो इस मंत्र का जाप करना चाहिए :-

Mantra in Hindi:-

भूत प्रेत निकट नहीं आवे | महावीर जब नाम सुनावे ||
संकट कटे मिटे सब पीरा | जो सुमिरे हनुमत बलबीरा ||
संकट ते हनुमान छुडावे | मन क्रम वचन ध्यान जो लावे || 
Mantra in English:-

Bhut Pret Nikat Nahi Aave | Mahaveer Jab Naam Sunave |
Sankat Kate Mite Sab Peera | Jo Sumire Hanumat Balbeera || 
Sankat Te Hanuman Chudave | Man Kram Vachan Dhyan Jo Laave ||

और हनुमान चालीसा का नित्य पाठ करने वाले भक्त के कभी भी किसी भी प्रकार का संकट नहीं हो सकता है | 

तथा ग्रहशांति और मृतात्माओं से छुटकारा या मुक्ति का उपाय श्रीमद्भगवद्गीता भी है अत: साधकों को गीता का पाठ करना चाहिए जिनसे उनके संकटों का निवारण हो तथा उनका कल्याण हो | और गीता का एक मंत्र भी इस दृष्टि से अति प्रभाकारी माना गया है |  श्री कृष्ण भगवान ने गीता के एक श्लोक में दिया है, इसमें अर्जुन ने भगवान श्री कृष्ण से संकट से मुक्ति का उपाय पूछा था तब भगवान ने कहा कि:-

In Hindi:-

कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः
पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः |
यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे
शिष्येस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ||

In English:-

KarpanyaDoshopahat Svabhav:
Prichchhami Tvam DharmaSammoodacheta: |
Yachchhreya: Syannishchitam Bruhi Tanme
Shishyesteaham Shadhi Mam Tvam Prapannam ||

इस प्रकार इस मंत्र का जाप करने से भक्तों के सभी प्रकार के संकट दूर हो जाते है व गीता के पाठ करने के साथ साथ अगर इस मंत्र का जाप किया जाये तो उस मनुष्य का कल्याण हो जाता है |

beejakshara mantra Mantra to Visitation Of God

भगवान के दर्शन प्राप्त करने के लिए

In Hindi:-

भक्त बछल प्रभु कृपानिधाना |
बिस्वबास प्रकटे भगवाना ||

In English:-

Bhakat Bachhal Prabhu Kripanidhana | 
Bisvabas Prakate Bhagawana ||

यह मंत्र रामचरितमानस से उद्धृत है, रामचरितमानस में कहा गया है कि भगवान भक्त वत्सल है और कृपानिधान है, तथा भगवान अपने भक्तों के प्रेम के सागर में खो जाते है, और जो भक्तजन विश्वास और श्रृद्धा से उनको भजते है, तो भगवन ऐसे भक्त के विश्वास को कभी भी हानि नहीं पहुंचाते है |

इसीलिए भगवद्गीता में भी भगवान श्रीकृष्ण, अर्जुन से कहते है कि हे पार्थ – जो भक्तजन सभी तरफ मुझ परमात्मा को देखता है, और मुझ में स्थित होकर मेरे परायण होकर मुझ सच्चिदानंदघन सवरूप का ध्यान करता है | ऐसे प्रेमिभक्त मुझे अत्यंत प्रिय है, और वो भक्त मुझ परमेश्वर को प्राप्त होकर मोक्ष प्राप्त करते है | 
                                                                                                                                                 (भगवद्गीता)

इसलिए कहा गया है कि :-
हरि व्यापक सर्वत्र समाना | प्रेम ते प्रकट होई मैं जाना ||
                                                                                          (रामचरितमानस)

Sunday, 10 November 2013

beejakshara mantra Mantras From Bhagavad-gita


(त्रिकाल संध्या) भोजन के समय बोले जाने वाले मंत्र

कर्मों की महिमा बताते हुए भगवान श्री कृष्ण अर्जुन से कहते है कि हे पार्थ ! तुम जो भी करते हो, जो भी खाते हो, जो भी बोलते हो और जो भी सोचते हो सब मुझको समर्पित कर दो | ऐसा करने से तुम सभी प्रकार से अच्छे कर्म के भागी बनोगे |

अत: मनुष्य को भगवद्गीता में भगवान के कहे वचनों का पालन कर सब कुछ प्रभु को सरेपित करते हुए जीवन जीना चाहिए | तथा अपने आप को उनकी कृपा का पात्र बनाना चाहिए |

मंत्र इस प्रकार हैं :-
यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः |
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ||
                            (गीता श्लोक)
In English:-                    

Yagyashishtashin: Santo Muchyante Sarvakilbishe: |
Bhunjate Te Tvagham Papa Ye Pachantyaatmakarnat ||



यत्करोषि यदन्श्रासि यज्जुहोषि ददासि यत् |
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ||
                        (गीता श्लोक)
In English:-
                                             Yatkaroshi Yadnshrashi Yajjuhoshi Dadaasi yat |
                                             Yattpasyasi Kontey Tatkurushva Madrpanam ||


अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः |
प्रानापानसमायुक्त: पचाम्यन्नं चतुर्विधम् ||
                        (गीता श्लोक)
In English:-
                                               Aham Veshvanro Bhutva Praninam Dehmashrit: |
                                               Pranapansmayuktam: Pchamyannam Chaturvidham ||

!! शांति प्रार्थना !!

ओम सहनाववतु सहनौभुनक्तु सहवीर्यं करवावहै |
तेजस्वी नाव धीतमस्तु मा कस्चिददुखभागभ्वेत ( मा विद्विषावहै ) ||

In English:-

                    Om Sahnavavtu Sahnobhunktu Sahviryam Karvavahe |
                       Tejsvi naav Dhitmastu Maa Kaschidadukhbhagbhavet ( Maa Vidvishaamhe ) ||

यह सभी श्लोक भगवदगीता से लिये गए है, और यह श्लोक भगवान श्रीकृष्ण के मुखारविंद से निकले हुए है, गीता में भगवान कहते है कि जो कोई भक्त यज्ञ, तप, और दानादि का अंश मुझमे अर्पित करना है वह भक्त मुझको अत्यंत प्रिय है और वह सब प्रकार के पापों से मुक्त होकर मुझको ही प्राप्त होता है |

और श्रीभगवन ने यह भी कहा है कि जो भी तुम करते हो, खाते हो, देते हो, सोचते हो उन सब का फल मुझे अर्पण करने से भवसागर से मुक्ति मिलती है और मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है |

अर्थात कहने का तात्पर्य यह है कि मनुष्य को चाहिए कि बड़ी मुश्किल से उसे जो यह मानव देह (मनुष्य देह) मिली है, उसे व्यर्थ न गवांकर भगवान कि शरण में अर्पित करनी चाहिए | गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी रामचरितमानस में इसका उल्लेख किया है:-

“ बड़े भाग मानस तनु पावा | सुर दुर्लभ सद ग्रंथन गावा ”

मंत्र उपयोग:-

इन मन्त्रों को भोजन करने से पहले बोलना श्रेष्ठ रहता है, और इन श्लोकों को बोलते समय भगवान श्री कृष्ण का स्मरण करते रहना चाहिए | जिससे कि मनुष्य का खाना पापियों को प्राप्त न होकर भगवान को अर्पित होता है | और श्री कृष्ण ने भी गीता में यही कहा है कि “अहं वैश्वानरो भूत्वा ” अर्थात में ही सब कुछ हूँ | में ही बीजमंत्र हूँ, और में ही सब प्राणियों कि आत्मा हूँ, में ही विश्व का संचालक हूँ, और में ही संहारकर्ता अर्थात सब मे मैं (परमात्मा) स्थित हूँ और सब मुझ में स्थित है |

(श्री कृष्ण)

Saturday, 9 November 2013

beejakshara mantra Krishna Mantra to Getting Full Success

विजय प्राप्ति के लिए कृष्ण मंत्र (श्लोक)

Krishna With Arjun
अगर आपको किसी भी क्षेत्र में विजय प्राप्त
करनी हो या जीवन में आने वाली विपरीत परिस्थितियों में आगे बढना हो तो श्रीमद्भगवद्गीता के इस श्लोक का जाप करना चाहिए |

In Hindi:-

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति: भारत: |
अभ्युत्थानम अधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम ||
(भगवद्गीता चतुर्थोध्याय श्लोक ७ )


In English:-

Yada Yada Hi Dharmasya Glanirbhavati Bharat: |
Abhyutthanam Adharmasya Tadatmanam Srijyamyaham ||
                                                             (Bhagavatgita Chapter 4, Shlok 7 )

सभी प्रकार की विजय और श्री, संपत्ति आदि प्राप्त करने के लिए प्रतिदिन नीचे दिए गए मंत्र का कम से कम 108 बार जप करे |

In Hindi:-
यत्र योगेश्वरः श्रीकृष्ण: यत्र पार्थो धनुर्धर: |
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ||

In English:-
Yatra Yogeshvar: Shrikrishna Yatra Partho Dhanurdhar: |
Tatra Shrirvijayo Bhutirbhurva Nitirmatirmam ||

Friday, 8 November 2013

beejakshara mantra Mantras for Happiness (What's Happiness?)

सुख की अनुभूति और सुख का अनुभव

आज मैं जिस शब्द या जिस प्रसंग पर चर्चा कर रहा हूँ वह आज की परम आवश्यकता है, क्योकि आजकल के इस द्रुतगामी युग में प्रत्येक प्राणी सुख की भिन्न-भिन्न परिभाषाओं में अपना जीवन जी रहे है | और आश्चर्य की बात यह है कि किसी को भी असली सुख की अनुभूति ही नहीं होती है | क्यों ?

इस क्यों का उत्तर यह है कि किसी को यह ज्ञान नहीं है कि असली सुख क्या है, कोई पैसों को सुखा समझता है तो कोई परिवार को, और कई लोगों ने तो सुख कि परिभाषा ही बदल दी | मनुष्यों ने धन-दौलत, गाडी-बंगला, और सांसारिक भोगों को भोगना ही सुख मान लिया | परन्तु इन सब के बावजूद भी प्राणी सुखी नहीं है क्यों ?
क्योकि मनुष्य को सुख का अर्थ ही समझ में नहीं आता है |


सुख :- यथार्थ में सुख का अर्थ है शांति, और जहाँ शांति है वहाँ सुख है | शांति का वास मन कि प्रसन्नता में है और मन तभी प्रसन्न होता है जब मन शांत हो जाये अर्थात उसमे कामनाओं का त्याग हो जाये | प्रत्येक प्राणी के सुख के पीछे इन्द्रियों का अनुभव छुपा होता है अर्थात मनुष्य इन्द्रियों द्वारा सुख कि अनुभूति करता है, परन्तु असली सुख तो शांति ही है |
और भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि:-
अशान्तस्य कुतः सुखम् 

अर्थात जहाँ अशांति है वहाँ सुख नहीं हो सकता है, आज का मनुष्य इस संसार की चमक में चकाचौंध होकर सुख की चाह मैं भौतिक संसाधनों को जुटाने में लगा रहता है और मन में परिकल्पनाओं का अम्बार लगता रहता है और अशांत रहता है और दिखावे के लिए खुश रहता है, पर वास्तव में वह खुश नहीं रहता क्योकि वह अपने मन को वश में तो कर नहीं सकता और कितना भी परिश्रम कर ले पर मन और आकांक्षाओं का कभी भी अंत नहीं होता और वह कभी भी सुखी नहीं होता है |

मनुष्य का मन और मस्तिष्क भी उसके शत्रु हो सकते है अगर इनको आपने अपने नियंत्रण में नहीं रखा है | क्योकि मनुष्य का मन प्रत्येक क्षण कुछ न कुछ कल्पना करता रहता है और मनुष्य का मस्तिषक कल्पना करता है की मैं फलां वस्तु प्राप्त कर तृप्त हो जाऊंगा तो उसके यह विचार मिथ्या है क्योकि मनुष्य कभी भी अपने मस्तिष्क और मन की कल्पनाओं की पूर्ति नहीं कर सकता है |

आपको अगर सही मायनों में सुख की खोज है तो आपको सही रास्ता खोजकर उसे अपनाकर ही सही खुशी  जीवन की अनुभूति प्राप्त कर सकते है | उस सन्मार्ग का संकेत करते हुए भगवान श्री कृष्ण अर्जुन से कहते है कि:-

विहाय कामान्य: सर्वान्पुमांश्चरति नि:स्पृह: |
निर्ममो निरहंकारः स शान्तिमधिगच्छति ||
                                                            (गीता-श्लोक)
                                        
अर्थात:- यदि कोई प्राणी सुख और शांति चाहता है तो उसे अपनी इच्छाओं और कामनाओं कि पूर्ति का प्रयत्न करना चाहिए | और मन में उठने वाले विचारों और संकल्पों का वध करना होगा, अपनी इन्द्रियों पर कठोरता से संयम रखना होगा इस प्रकार करने से मनुष्य सुखी हो सकता है | तथा भगवान ने गीता में कहा है कि:-

आपुर्यमाणमचलप्रतिष्ठं 
समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्धत |
तद्धत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे
 स शांतिमाप्नोति न कामकामी ||
                                        (गीता-श्लोक)

अर्थात:- वह मनुष्य जिसकी कामनाएं कभी शांत नहीं होती वह कदापि सुखी नहीं होता है अर्थात कामना करने वाला कभी सुखी नहीं हो सकता है | जो मनुष्य उत्त्पन्न होने वाली कामनाओं को शांत करना जानता है वही सुख प्राप्त कर सकता है, जैसे सैकडों नदियों के जल मिलने पर भी समुद्र क्षुब्ध नहीं होता वैसे ही कामनाओं के प्रवाह में मनुष्य को क्षुब्ध नहीं होना चाहिए, और जैसे गरम लोहे पर पानी की बूंदे लुप्त हो जाती है वैसे ही संयम से इच्छाओं और कामनाओं को वश में किया जा सकता है |

आज के इस भौतिक युग में प्रत्येक मनुष्य अपने खुशी और कामनाओं की पूर्ति के लिए दूसरों के सुखों का दमन करता है और दूसरों पर अत्याचार करके अपने सुख और आवश्यकताओं की पूर्ति करता है पर वह यह नहीं जनता की यह सुख और कामनाये तो क्षणिक है पर जब इस क्षणिक शरीर का भी त्याग होगा तब यह सुख संसाधन यही छूट जाते है और उन पापों और अत्याचारों का हिसाब होगा तब उनके पास पछताने से भी कुछ नहीं होगा | इसलिए समय रहते उस भौतिकवादी सुखो से निकलकर अपने आप को आध्यात्मिक और आध्यात्म की और बढ़ो तब आपको अहसास होगा की असली और यथार्थ सुख क्या है | और आपका मन कभी भी अशांत नहीं रहेगा और आप कभी भी दुखी नहीं रहेंगे | 

(जय श्री कृष्ण)

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