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Sunday, 1 December 2013

beejakshara mantra Meditation And Meditation Techniques

 ध्यान (Meditation) क्या है ? और यह कैसे किया जाता है

ध्यान अर्थात Attention, हमारे मन तथा बुद्धि को एकाग्र और केंद्रित करने के लिए जो प्रक्रिया हम उपयोग में लेते है, उसे ही हम ध्यान (Meditation) कहते है | परन्तु यह प्रक्रिया केवल मन (चित्त) और विवेक को केंद्रित ही नहीं करती बल्कि हमारे मस्तिष्क को भी एक निश्चित जगह पर केंद्रित करके मन को स्थिर कर देती है |

Lord Shiva In Meditation
ध्यान के कई सिद्धांत बड़े बड़े महर्षियों और महापुरुषों ने दिए है और ध्यान क्या है, वैज्ञानिक अभी भी इसी गहमागहमी में उलझे हुए है लेकिन भारतवर्ष तो आदिकाल से ही ध्यान की परम्परा का निर्वहन कर रहा है और आज भी करता है, प्राचीन काल में भारत के ऋषि-मुनि ध्यान में भगवान का चिंतन किया करते थे और समाधिस्थित होकर अपने शरीर को स्थिर कर लेते थे तथा प्राणायाम द्वारा प्राण वायु को रोकना आदि उनके प्रतिदिन के दिनचर्या के अंग हुआ करते थे, पर प्राणायाम और ध्यान दो भिन्न भिन्न शब्द है और दोनों का ही अलग अलग विधान होता है | हम ध्यान पर चर्चा कर रहे थे की ध्यान है क्या ?

ध्यान (Meditation):- ध्यान मानसिक चेतना का वह साधन या स्वरूप है जिसमे जीव अपने मन में स्थिर किये हुए किसी एक निश्चित बिंदु पर विचार अथवा ध्यान को केंद्रित करता है और उसी बिंदु विशेष का चिंतन करने का प्रयत्न करता है और उसको मानसिक से वास्तविक अवस्था में लाने का प्रयत्न करता है | इस प्रक्रिया को ही ध्यान कहते है |

ध्यान (Meditation In English):- Meditation In English

ध्यान के प्रकार (Types of Meditation):- ध्यान (Meditation) को कई भागों में विभाजित किया गया है पर मुख्यत: ध्यान तीन भागों में माना जाता है -
  1. सरल और सहज ध्यान (जैसे किसी तेज आवाज पर आपका ध्यान जाना)
  2. बलात् ध्यान (किसी मानचित्र या चित्र को देखने की स्थिति में ध्यान)
  3. अर्जित ध्यान (अर्जित ध्यान जैसे किसी पुस्तक में पढ़ना)
यह सभी ध्यान साधारण ध्यान की श्रेणी में आते है, क्योकि जिस ध्यान की बात मैं कर रहा हूँ वो तो जड़ अर्थात चैतन्य अवस्था है उस ध्यान को चिंतन या समाधि में स्थित होकर स्थिर होना भी कहा जाता है |

वैसे तो ध्यान (Meditation) को परिभाषित करना भी किसी चुनौती से कम नहीं है क्योंकि ध्यान वह अवस्था है   जिसे समझने के लिए ध्यान के लक्षित अर्थ का ज्ञान होना भी परम आवश्यक है |

Lord Mahaveer's Meditation
उदाहरणार्थ :- ध्यान की अवस्था समझाने हेतु में आपको आपके ध्यान की अवस्था में ले जाना चाहूँगा जो आपने कई बार जाने अनजाने में किया होगा जैसे की मैं पहले चर्चा कर चुका हूँ कि साधारण और योग युक्त ध्यान में बड़ा अंतर है | साधारण ध्यान में अखबार पढते हुए ध्यान लगाना, किसी धमाके की आवाज पर ध्यान जाना आदि | पर कभी कभी आपने ऐसा चित्र या तस्वीर देखी होगी जो साधारण दृष्टि से देखने पर उसमे कुछ नहीं दिखता पर 10 से 15 मिनट तक एक ही जगह ध्यान केंद्रित कर देखने पर स्पष्ट होता है कि इसमें अंदर कि ओर एक और चित्र है जो केवल ध्यान लगाने पर ही दिखताहै और जैसे ही नजर या पलक झपकती है वह आकृति ओझल हो जाती है, इस प्रक्रिया को ही ध्यान कहते है, पर यह ध्यान का केवल एक प्रथम स्वरूप या प्रथम सोपान है |

ध्यान तो मनुष्य को उसके जीवन का सही मूल्य समझाने की एक सीढ़ी है | ध्यान के द्वारा ही मनुष्य को उसकी असली उपयोगिता का पता चलता है और ध्यान ही वह उपाय है जिससे मनुष्य शरीरिक और मानसिक रूप से मजबूत हो सकता है |

ध्यान करने की विधि (Meditation Techniques):- ध्यान करना कोई बड़ा कठिन कार्य नहीं है अपितु ध्यान सरल भी नहीं है | ध्यान करने के लिए कई भ्रान्तियाँ फैली हुई है जैसे कि ध्यान केवल एकांत वाले स्थान पर ही होता है, ध्यान के लिए मनुष्य को आसन पर बैठकर आँखे बंद कर बैठना पड़ता है इत्यादि | परन्तु ऐसा नहीं है, ध्यान कोई भी कभी भी किसी भी स्थान पर किया जा सकता है बस जरूरत है तो दृढ संकल्प की |
  • ध्यान करने कि विधि में प्रथम चरन में आप कुछ भी कर रहे हो तो उस कम में तन्मयता से और एकाग्रचित्त हो जाइये, इतना तल्लीन हो जाइये कि आप भूल जाएँ कि आप कहाँ पर है, समय क्या हुआ है इत्यादि |
  • चलिए इन सब बातों को छोडिये और हम अलग विधि कि बात करते है, कल्पना करिये कि आप लेटे हुए या कही पर बैठे हुए हो, और आप ध्यान लगाने कि सोच रहे हो | ध्यान के लिए सबसे पहले यह विचार करना चाहिए कि आप क्या सोच रहे हो, अत: ध्यान करने के लिए आप तैयार हो जाइये और जो कुछ भी सोचना बंद कर देवें तथा अपने मन तथा मष्तिष्क को शांत कर दे | अब आप ध्यान को किसी एक निश्चित बिंदु पर केंद्रित करने का प्रयास कीजिये जैसे कि आपकी साँस ऐसा करते समय यह ज्ञात रहे कि आपको आपकी साँस कि गति में इतना ध्यान केंद्रित करना है कि प्रत्येक साँस कब अंदर आ रही है और कब बाहर जा रही है अर्थात पेट का ऊपर उठना और निचे जाने पर ही ध्यान केंद्रित करें | और विचारों का आवागमन बंद कर दे, और आपको आने वाले हर विचार को आने दे और जाने दे तो कुछ समय बाद आपको महसूस होगा कि आपका ध्यान केंद्रित होने लगा है ऐसा आप प्रत्येक वस्तु पर ध्यान का प्रयोग कर अपने ध्यान कि क्षमता को बढ़ा सकते है |
यह सब तो केवल ध्यान का शुरूआती सोपान है, ध्यान तो गहराइयों में उतरता चला जाता है जिससे मनुष्य का जीवन ही बदल जाता है | 

भगवद्गीता में ध्यान का रहस्य (Meditation In Bhagawad-Gita):- एक और प्रकार के ध्यान कि बात मैं करना चाहूँगा जो आसन पर बैठकर किया जाता है जो ध्यान योगीजनों के लिए श्रेष्ठ माना गया है जिसमे मनुष्य कि चेतना का परमात्मा से मिलन होता है और जो ध्यान सब सृष्टि से परे होता है अर्थात इस ध्यान को केवल तत्वज्ञानी योगी ही कर सकते है, इस तरह के ध्यान को चिंतन भी कहते है | 

यह ध्यान कि पराकाष्ठा है जिसे भगवान श्री योगेश्वर कृष्ण ने गीता में कहा था | भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को कहते है कि हे पार्थ ! जो मनुष्य अपने आप को मुझ में स्थापित कर, स्नानादि से निवृत होकर शुद्ध आसन पर विराजमान होकर आँखे बंद कर मन को एकाग्र करना चहिये और अगर आँखे खुली है तो आँखों कि पुतलियों को एक जगह पर स्थिर करना चहिये और विचारों के प्रवाह को रोकने का प्रयत्न करना चहिये तथा आँखों कि पुतलियों को स्थिर करना चाहिए क्योकि पुतलियों के हिलने से ध्यान दूसरी जगह जाता है और इस तरह से मन में विचार उत्पन्न होते है तथा मन कि इन्द्रियों और क्रियाओं को वश में करना चाहिए तथा केवल परमात्मा का स्मरण करना चाहिए और ध्यान को केवल परमात्मा में ही स्थित करने का प्रयत्न करना चाहिए |  ऐसा करने से कुछ ही देर में मन शांत हो जाता है और ध्यान आज्ञा चक्र पर स्थित हो जाता है और परम ज्योति स्वरुप परमात्मा के दर्शन होते हैं | 

Meditation By Osho :-ओशो ने आज के युग में एक आदर्श के रूप में ध्यान की परिभाषा दी तथा मनुष्यों को समझाने के लिए प्रेरित किया कि असल में ध्यान क्या है और यह किस किस प्रकार से हो सकता है | तथा ध्यान करना कितना आसान है यह भी ओशो ने भली-भांती बतलाया है |


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Monday, 18 November 2013

beejakshara mantra Significance Of Om And Omkar Mantra

ओ३म् (ॐ) या ओंकार का अभिप्राय और महत्ता

ओंकार - परमाक्षर
ओ३म् (ॐ) क्या है:- ओ३म् (ॐ) का शाब्दिक और सरल अर्थ प्रणव अर्थात परमेश्वर से है, ओ३म् वास्तविकता में सम्पूर्ण सृष्टि कि उद्भावता कि ओर संकेत करता है, कहने का तात्पर्य यह है कि ओ३म् से ही यह चराचर जगत चलायमान है और इस संसार के कण कण में ओ३म् रमा हुआ है |

ओ३म् किसी भी एक देव का नाम या संकेत नहीं है, अपितु हर धर्म को मानने वालों ने इसे अपने तरीके से प्रचलित किया है | जैसे ब्रह्मा-वाद में विश्वास रखने वाले इसे ब्रह्मा, विष्णु के सम्प्रदाय वाले वैष्णवजन इसे विष्णु तथा शैव या रुद्रानुगामी इसे शिव का प्रतिक मानते है और इसी तरीके से इसको प्रचलित करते है | परन्तु वास्तव में ओ३म् तीनों देवो का मिश्रित तत्त्व है जो कि इस प्रकार है:-


 ओ३म् (ॐ) शब्द में  "अ" ब्रह्मा का पर्याय है, और इसके उच्चारण द्वारा हृदय में उसके त्याग का भाव होता है। "उ" विष्णु का पर्याय है, इसके उच्चारण  द्वारा त्याग कंठ में होता है तथा "म" रुद्र का पर्याय है और इसके उच्चारण  द्वारा त्याग तालुमध्य में होता है। इन तीनो देवों (त्रिदेवों) के संगम से यह ओ३म् (ॐ) बना है |

ओ३म् (ॐ) की महत्ता:- हम जिस ब्रह्माण्ड में रहते है उसमे ओ३म् (ॐ) सर्वव्यापी है अर्थात सभी जगह व्याप्त है | ओ३म् (ॐ) के बिना इस संसार कि कल्पना भी नहीं कि जा सकती है | जब आप योग या ध्यान कि मुद्रा में बैठते होंगे तब आपको महसूस होता होगा कि बिना ओ३म् (ॐ) का जाप किये ही आपको अपने आप ही अनवरत रूप से ओ३म् (ॐ) कि ध्वनि आ रही है | यह तभी होता है जब आप ध्यान कि मुद्रा में पूर्ण रूप से खो जाते है अर्थात चरम तक पहुच जाये |  ईश्वर का वाचक प्रणव 'ॐ' है, तथा इसी ओम् में सारी सृष्टि समायी हुई है |

ओम् कि महत्ता तो यहाँ तक है कि माना जाता है कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में   ओ३म् (ॐ) की ध्वनि से पूर्ण ब्रह्माण्ड गुन्जायमान रहता है | तथा इस  ओ३म् (ॐ) मंत्र को परम पवित्र और परम शक्तिशाली माना जाता है | यह  ओ३म् (ॐ) ही हमारे प्राण अर्थात श्वास को नियंत्रित करता है तभी तो मनुष्य को श्वास लेते समय  ओ३म् (ॐ) कि ध्वनि का अहसास होता है |
तथा शास्त्रों में कहा गया है कि  ओ३म् (ॐ) मंत्र बहुत शक्तिशाली मंत्र है और इसका प्रभाव भी त्वरित होता है एवं  ओ३म् (ॐ) को किसी मंत्र के साथ जोड़ दिया जाये तो वह मंत्र पूर्णतया शुद्ध, पवित्र और शक्तिशाली हो जाता है | 

तभी तो शास्त्रानुसार सभी मन्त्रों के पूर्व  ओ३म् (ॐ) लगाने का विधान है, जैसे श्रीराम का मंत्र — ॐ रामाय नमः, भगवान विष्णु का मंत्र — ॐ विष्णवे नमः, भगवन शिव का मंत्र — ॐ नमः शिवाय, आदि अत्यधिक प्रचलित है। कहा जाता है कि ॐ से रहित कोई मंत्र फलदायी नही होता , चाहे उसका कितना भी जाप हो। मंत्र के रूप में मात्र ॐ भी पर्याप्त है। माना जाता है कि एक बार ॐ का जाप हज़ार बार किसी मंत्र के जाप से महत्वपूर्ण है । ॐ का दूसरा नाम प्रणव ( परमेश्वर ) है। "तस्य वाचकः प्रणवः" अर्थात् उस परमेश्वर का वाचक प्रणव है। इस तरह प्रणव अथवा ॐ एवं ब्रह्म में कोई भेद नहीं है। ॐ अक्षर है इसका क्षय तथा विनाश नहीं होता ।

ओ३म् (ॐ) का मार्मिक महत्व समझने के लिए उदारहण लेते है कि कोई मनुष्य संगीत कि दीक्षा लेने गुरु के पास जाता है तो गुरुजी सबसे पहले शिष्य को सुर (सा, रे गा, मा..) और ताल तथा रियाज (अभ्यास) करने को कहते है, पर कभी मंथन किया है कि जब संगीतकार लयबद्ध होकर निरंतर सुर को ऊँचा करता जाता है और तथा श्वास को रोके हुए सुर लेता है तो उसमे भी ओ३म् (ॐ) कि श्वनी आती है | अर्थात तात्पर्य यह है कि जब मनुष्य अपने से ऊपर उठकर उस परमात्मा के संपर्क में आता है तब ओ३म् (ॐ) का अनुभव अपने आप ही होने लगता है |

ओंकार का अभिप्राय और महत्ता:- ओ३म् (ॐ) + कार शब्द से ओंकार बना है जो कि ओ३म् (ॐ) का कार्य को प्रतिपादित करता है | अर्थात "अ" (ब्रह्मा) का कार्य सृष्टि की रचना है, "उ" (विष्णु) का कार्य सृष्टि के पालनपोषण का है तथा "म्" (शिव) का कार्य सृष्टि का संतुलन बनाये रखना अर्थात शिव संहारक है | अब सभी को यह भलीभाँति पता चल गया होगा कि ओ३म् (ॐ) तथा ओंकार के बिना संपूर्ण ब्रह्माण्ड अधूरा है तथा इस ब्रह्माण्ड में ओ३म् (ॐ) से बढ़कर कोई नहीं है |

ओ३म् (ॐ) तथा ओंकार से कार्य सिद्धि:- ॐ धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों का कर्ता-धर्ता है । केवल ॐ का जप कर कई साधकों ने अपने उद्देश्य की प्राप्ति कर ली। गोपथ ब्राह्मण ग्रन्थ में उल्लेख है कि जो कोई भी श्रृद्धा सहित कुश के आसन पर पूर्व की ओर मुख कर एक हज़ार बार ॐ के मंत्र का जाप करता है, उसके सब कार्य सिद्ध हो जाते हैं। तथा उसे परम तत्त्व कि प्राप्ति होती है |

ओ३म् (ॐ) के बारे में अधिक जानकारी के लिए क्लिक करें:- ओ३म् (ॐ) और ओंकार

Click Here To Get Details about Om In English:- Om And Omkar

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Monday, 4 November 2013

beejakshara mantra Mantra for Improving Memory (How to make your brain sharper & strong?)

How to improve your memory ?

Human Brain
मानव का मन महान शक्तियों का बहुत बड़ा भंडार है( Dynamo of Creative Energy) | एक से बढकर एक शक्तिया इसमें निवास करती है | छोटे, बड़े, विद्वान और मुर्ख सभी को बीज रूप में परमात्मा ने यह शक्तिया दी है | जो मानव इनको जाग्रत करके इनका उपयोग करते है वो महामानव बनते है | अगर मूर्ख से मूर्ख व्यक्ति भी इनको जाग्रत करे तो वो भी बुद्धिमान बन जाता है | इनको जाग्रत करके बड़े चमत्कार किये जा सकते है | असंभव दिखने वाले कार्यों को भी सहजता से किया जा सकता है |मानसिक शक्तियों का प्रदर्शन परिपुष्ट मष्तिष्क द्वारा ही किया जा सकता है | उत्तम मष्तिस्क द्वारा ही मन अपने अदभुद सामर्थ्य का प्रदर्शन कर सकता है |

आप मष्तिष्क को केवल एक अतिसूक्ष्म यंत्र या डायनेमाँ समझ लीजिए | बिजली पैदा करने वाले डायनेमाँ के भाति मष्तिष्क विचार उत्पन्न करता है |हमारे मष्तिष्क के विभिन्न भागो में भिन्न भिन्न शक्तियों के सूक्ष्म केंद्र है | कुछ शक्तियों का केन्द्र मष्तिष्क के अग्र भाग में और कुछ का मध्य भाग में और कुछ का पृष्ठ भाग में है | मष्तिष्क के जिस भाग में यह शक्तियां निवास करती है उस भाग में स्थित कोषो(Cells) की संख्या के परिणाम में यह शक्तियां कम या ज्यादा होती है |सेल्स की संख्या को बढ़ाने हेतु मष्तिष्क के उस भाग पर ध्यान करे व भावना करे की शरीर की सारी शक्ति उस भाग को उन्नत कर रही है | रक्त संचार उस भाग में ज्यादा हो रहा है ऐसी  भावना करने से मष्तिष्क के उस भाग की कोशिकाए सक्रीय हो जायगी व उस भाग से सम्भदित शक्तियों का विकास होने लगेगा | मस्तिष्क के जो भाग निक्कमे छोड़ दिए जाने के कारण निष्क्रिय हो जाते है उन्हें भी इस प्रकार जाग्रत किया जा सकता है |

मष्तिष्क को शक्तिशाली बनाने के लिए तीन चीजे जरुरी हैं :     

1. उत्तम व पूर्ण परिपुष्ट मष्तिष्क                                      
2. मानसिक शक्तियों का यथार्थ ज्ञान                     

3. मानसिक शक्तियों का पोषण और संचय

1. भक्तिभाव पूजाभाव श्रृद्धा भाव शक्तियों का केन्द्र मष्तिष्क मुर्धन्य है | जिन लोगोकी मूर्धा में यह कोष कम होते है उन लोगो में गुरुजनों व् ईश्वर में विश्वास कम रहता है |

2. जो शक्तियां  कपाल के निचे अर्ध भाग में निवास करती है, वे विद्या कला खोज से सम्बन्धित है जिनमे यह विकसित  होती है वे लोग निरर्थक बाते नहीं करते है व्यवस्था पूर्वक कार्ये करते है | किसी कार्ये को एक बार हाथमे लेकर छोड़ते नहीं बल्कि पूरा करते है | यद्धपि उनमे तर्क वितर्क करने की क्षमता नहीं होती, किन्तु फल प्राप्त करने की सामर्थ्ये रखते है | यदि आप इन शक्तियों को बढ़ाना चाहते है तो आप कपाल के निचे अग्र भाग के कोशो की वृद्धि करे, आप अपनी चित्तवृति मस्तिष्क के मध्य बिंदु पर एकाग्र करे | निरंतर सोचने से उस भाग मे कोशो की वृद्धि होगी और वो भाग पुष्ट होने से इन शक्तियों का विकास होगा |

3. कपाल के ऊपरी आधे भाग में बुद्धि की शक्तिया अपना कार्य करती है | इस भाग का विकास करने के लिए मस्तिष्क के मध्य बिंदु पर एकाग्र कीजिए | निरंतर सोचने से उस भाग में रुधिर की गति बढ़ेगी व एकाग्रता से वह भाग पुष्ट होने लगेगा कपाल के ऊपरी आधे भाग में बुद्धि की अपनी शक्तियां  काम करती है | इस भाग का विकास करने के लिए मस्तिष्क के मध्य बिंदु से कपाल के ऊपर के अर्द्ध भाग तक रहने वाले सूक्ष्म द्रव्यों पर एकाग्रता करनी चाहिए | इस भाग के कोशो की वृद्धि से बुद्धि की शक्ति बढती है और विषयो को समझने की शक्ति में वृद्धि होती है | नित्य अभ्यास से उसकी शक्ति इतनी बढ़ जाती है की व्यक्ति जिस विषय पर सोचता है उस विषय पर आर से पार सोच सकता है |

4.. कान के छिद्र के आगे से सिर की चोटी तक एक खड़ी सीधी रेखा खीचिये जहा पर इसका अंत होगा उसके ठीक पीछे के भाग में श्रद्धा, दृढ़ता ,आत्मबल और विश्वाश आदि दिव्य शक्तियां निवास करती है | इन पर एकाग्रता करने से यदि कोष कम होंगे तो अधिक हो जायेंगे |दुर्बल होंगे तो सबल हो जायेंगे | और बलवान होंगे तो और बलवान हो जाएंगे |

5. मस्तिस्क के निचे, पीछे के भाग में प्रयास करने से सामर्थ्य शक्ति बढती है | जिस व्यक्ति में यह शक्ति विकसित अवस्था में होती है वो किसी काम को करने से पीछे नहीं हटता वो किसी भी काम को कठिन समझ कर यो ही नहीं छोड़ता क्योंकि उसे लगातार मस्तिष्क के उस भाग से सहारा मिलता है |

6. कपाल के ऊपर के भाग के भाग में जहा अंदर से बलों की जड़े शुरू होती है यह ज्ञान है की कब किस मौके पर क्या करना चाहिए ! इस निरीक्षण शक्ति को जाग्रत करने के लिए पूर्व कथनानुसार एकाग्रता करके वह के कोशो को परिपूर्ण और पुस्त करना चाहिए कठिन से कठिन गुत्थी भी इस क्रिया शक्ति से आसानी से सुलझाई जा सकती है

7. मष्तिस्क की बीच की  सतह से नाडीयो के 12 जोड़े निकलते है प्रत्येक जोड़ी शरीर को कुछ न कुछ ज्ञान देता है, ये नाडीया गर्दन को विशेष सन्देश भेजती है जिससे हमें कुछ न कुछ नवीन बात मालूम होती है इच्छा शक्ति का यथार्थ स्थान कहा है इसका उत्तर ओ ह्ष्णुहारा नमक लेखिका ने अपनी पुस्तक (concentration and the acquirement of personal magnetism ) में इस प्रकार दिया है :–

मेरी सम्मति में इच्छा अथवा संकल्प शक्ति का स्थित स्थान नाडीयो के उस तेजस्क ओज के भीतर निश्चित किया जासकता है जो मष्तिष्क को चारो और से घेरे हुए है अत: संकल्प शक्ति के विकाश के लिए यहाँ के कोसो की वृद्धि कीजिये |

मष्तिष्क के विभिन्न कोशो पर एकाग्रता करने परसे हमारे रुधिर की गति उस और होने लगती है और उनकी संख्या में वृद्धि और विकाश होता है |कोई भी कोष हो बढ़ाने जरुरी है यदि ये सब बढे तो उत्तम है अत: किसी विशेष भाग के कोष बढावे ऐसा न सोचकर इस भावना पर मन एकाग्र करे की हमारे मष्तिष्क के सब कोष निरंतर बढ़ रहे है हमारी निरीक्षण शक्ति, तुलना शक्ती, न्याय शक्ती,विवेक शक्ति, संकल्प शक्ती सभी को बढा रहे है | यह भाव मात्र उपरी दिखावा मात्र नहीं होकर पूर्ण अनुभूति युक्त होना चाहिए उस समय अपनी कल्पना द्वारा वैसा ही अनुभव करना चाहिए | साधको को प्रारंभ में आत्म स्वरुप की भावना करनी कभी नहीं भूलनी चाहिए |

कोशो की वृद्धि की क्रिया जमींन जोतकर करने के समान है| जिस प्रकार उत्तम रीति से जोते हुए खेत में बीज अच्छे उगते है उसी प्रकार के कोष वाले मष्तिष्क में मानसिक शक्तिया उत्तम रीति से विकसित होती है इसलिए जिस प्रकार की शक्ति को हम विकसित करना चाहते है उसका यथार्थ रूप हमारे लक्ष्य में रहना अनिवार्य है ध्याता में ध्यान करने की वस्तु के स्वरुप की यथार्थ कल्पना अत्यंत आवश्यक है योग शास्त्र का यह अखंडनीय सिद्धांत है ध्यान करने वाला जिसका ध्यान करता है उसी के सामान हो जाता है | अत: मानसिक शक्तियों का विकाश करने वाले जिस शक्ति का विकाश करना हो उसके स्वरुप को अच्छी तरह लक्ष्य में रखना चाहिए |

कल्पना कीजिये की हम अपने अंदर श्रृद्धा भक्ति भाव अंतर्ज्ञान इत्यादि आध्यात्मिक शक्तियां का विकाश करना चाहते है | इन शक्तिय्यो के जाग्रत और विकसित होने का स्थान मूर्धा और इसके नीचे का प्रदेश है | इन स्थानो मे एकाग्रता करते समय हम सच्ची भक्ति सच्ची श्रृद्धा और अंतर्ज्ञान के जिस नमूने को सामने रखेंगे वही इसमें क्रमश: प्रगट होने लगेगा | अत: जिस शक्ति के विकाश का हमने निश्चय किया है , उसके ऊँचे से ऊँचे स्वरुप की, जहा तक हमारी बुद्धि पहुच सके वहीतक कल्पना करनी चाहिए और उस कल्पना में व्रती को आरूढ़ करके पूर्वोक्त क्रिया श्रृद्धा पूर्वक करनी चाहिए| इससे मष्तिष्क के कोष बढ़ेंगे शुद्ध होंगे और वह काल्पनिक शक्ति धीरे धीरे बढ़ने लगेगी |

तीसरी बात है सामर्थ्य की | मन जिस सामर्थ्य को परिपुष्ट होता है उस सामर्थ्य की वृद्धि करने की भी आवश्यकता है | प्रत्येक मनुष्ये में यह सामर्थ्य एक बड़े परिणाम में वस्तुत रहता है पर अधिकांश व्यक्ति इसका अधिकतर भाग निक्कमी क्रियाओं में यो ही नष्ट कर दिया करते है | बैठे बैठे पांव हिलाना , आँख नाक या गुप्तांग टटोलते रहना , सार रहित बाते सोचना, या यो ही बे मतलब की बाते करते रहना या सुपारी चबाते रहना आदि शरीर की निक्कमी क्रियाँए  है | इनसे मन की सामर्थ्य शक्ति का ह्रास होता है क्रोध, चिंता, भय आदि विविध विकारों से तो सामर्थ्ये का बड़ा नाश होता है| जो दिन भर की आय होती है नाराजगी में बह जाती है| संचित सामर्थ्ये का भी ह्र्राश होता है | अत: मानसिक शक्तियों के इछुक को सब प्रकार के खस्यो ख्सयो से बचने की आवश्यकता है| मन पूरी शांत स्थिति में रहना अनिवार्य है| वाणी और शारीर के सब व्यर्थ प्रपंच छोड़कर मन को शांत स्थिति रखने का प्रयाश करना चाहिए इससे हमारा बल संचय होता है और हमें एक अद्भुत सामर्थ्य का अनुभव होता है | जिस संस्कारी व्यक्ति को इस बल का अनुभव हो उसे चाहिए की अपनी योग्य उचित वातावरण खोज ले और निरंतर मानशिक शक्तियों को पूर्वोक्त प्रकार से संचित करता रहे |

मानशिक शक्तियों की अभिवर्धि के लिए अनुकूल संगती और परिस्थितियों की परम आवश्यकता है | अपने उद्देश्य के अनुकूल उचित वातावरण उपस्थित करो | जिस वातावरण में मनुष्य रहता है वे ही मानसिक शक्तियां  क्रमश: उत्पन्न और बढती हुई दिखाई देती है | जिस व्यक्ति के परिवार मे, मित्रो मे, मिलने झुलने वालो में कभी अधिक होते है , वे प्राय: कभी ही हो जाया करता है | सेनिको व सिपाहियों के कुल में रहने वाला व्यक्ति प्राय: निडर हो जाया करता है| तुम जिस प्रकार की मानसिक शक्तियों का उद्भव चाहते हो वैसे ही व्यक्तियों में रहो, वैसी ही पुस्तकों का अध्यन करो, वैसे ही मनुष्यों के चित्र देखो और निरंतर वैसे ही चिंतन में मग्न रहो अपने अभीष्ट की भावना पर मन को एकाग्र कर गंभीरता पूर्वक स्थिर करो | उपयुक्त वातावरण में रहने से मानसिक व्ययामसे भिन्न-भिन्न क्रियाओ के अभ्यास से, मन की शक्ति तीव्र हो जाती है |

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