भावार्थ:- वसुदेवजी के पुत्र, राजा कंस और चाणूर मल्ल को मरनेवाले, माता देवकी को परम आनंद देने वाले और जगत के गुरु, ऐसे प्रभु श्री कृष्ण को में वंदन करना हूँ |
श्री कृष्ण भक्तो को इस मंत्र का प्रत्येक दिन कम से कम 108 बार संध्याकाल में जाप अवश्य करना चाहिए | इस प्रकार वंदना करने से भगवान श्री कृष्ण ओने भक्तों को निराश नहीं करते है और उनकी समस्त मनोकामनाये पूर्ण करते है |
सर्वमनोकामना सिद्धि तथा शत्रु पर विजय हेतु शिव मंत्र
Lord Shiva Shankar
भगवान शिव जो कि सृष्टि के विनाशकर्ता तथा संहारकर्ता है, और हिंदू मान्यताओं के अनुसार त्रिदेवो में इनका अहम कार्य है वो है संहार करना | अर्थात देवो के देव महादेव संहारक होते हुए भी जगत का आधार है और भक्तो में परम और करुना कि मूर्ति है | मनोकामना प्राप्त करने के लिए अर्थात मनोरथ सिद्ध करने हेतु तथा शत्रु का विनाश करने हेतु इस मंत्र का प्रयोग किया जाता है |
आदिकाल से ही भगवान शिव को कृपा करने और वर देने के लिए अग्रणी माना जाता रहा है और भगवन महादेव तो इतने भोले है कि कोई भी भक्त पूर्ण श्रृद्धा से और पूर्ण समर्पण से उनको जपता है तथा वे प्रसन्न होने पर यह नहीं देखते कि कौन उनसे क्या वर मांग रहा है, तभी तो इनको भोलेनाथ भी कहा जाता है | अत: मेरा अभिप्राय यह है कि भगवान भोलेनाथ को भक्त का श्रृद्धा और समर्पण भाव अति प्रिय है और शास्त्रों में कहा भी जाता रहा है कि "भगवान तो प्रेम के भूखे होते है, उन्हें कोई लालच दे तो उसकी उनके सामने क्या बिसात?" अर्थात प्रभु को मानाने के लिए दिखावे और आडम्बर की जरूरत नहीं है, प्रभु को प्रेम और समर्पित भाव से भजने में ही मनुष्य का सच्चा कल्याण है |
भगवान शिव के इस मंत्र को जपने वाले भक्तों के कभी भी विपत्तियां नहीं आती है और उनके सभी कष्टों का निवारण स्वयं भोलेनाथ करते है | सर्वमनोकामना सिद्धि तथा शत्रु पर विजय प्राप्ति का मंत्र इस प्रकार है:-
In Hindi:-
नमस्तेऽआयुधायानातताय धृष्णवे,
ऊँ रुद्राय नमः |
In English:-
Namaste Aayudhayanatataay Drishnave,
Ohm Rudraay Namah: |
जाप विधि:- भगवान शिव के इस मंत्र का जाप करने वाले भक्तो को चाहिए कि वे सोमवार के दिन प्रातकाल स्नानादि से निवृत होकर शुद्ध आसन पर पूर्वाभिमुख होकर विराजमान होवे तदन्तर मंत्रारम्भ करे | और मंत्र जाप करते समय भगवान शिव का निरंतर स्मरण करते रहे | भगवान शिव के इस सर्वमनोकामना और शत्रु विजय मंत्र का फल पाने हेतु कम से कम 108 से 1108 बार जाप करे | इस प्रकार सोमवार से जाप आरम्भ करने पर प्रत्येक दिन 108 बार इस मंत्र का अगले सोमवार तक जाप करे या मनोकामना प्राप्ति तक मंत्र जाप करे | ऐसा करने से भगवान शिव प्रसन्न होते है और भक्त कि मनोकामना कि पूर्ति अवश्य होती है |
इस मंत्र के जाप करने से सभी तरह की मनोकामनाओं की पूर्ति होती है तथा जमीन-जायदाद आदि विवादों का निपटारा होता है, और शत्रु पर विजय पाने के लिए भी इस मंत्र का उपयोग श्रेष्ठ माना गया है |
श्री रामभक्त हनुमान जी के लिए इस संसार में कोई भी कार्य दुष्कर नहीं है | भक्तशिरोमणि हनुमान जी की कृपा होने पर उनके भक्तों के भी सभी कार्य उतनी ही सुगमता से हो जाते हैं जैसे हनुमान जी प्रभु श्री राम के कार्य को करते हैं |
तुलसीदास जी ने हनुमान जी का बड़ा सुन्दर वर्णन किया है :-
विद्यावान गुणी अति चातुर,
राम काज करिबे को आतुर |
तथा
दुर्गम काज जगत के जेते,
सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते |
Hanuman Ji
अतएव जो कोई भी भक्त श्रृद्धा सहित श्री राम और हनुमान जी की वंदना करता है और नीचे दिए गए मंत्र का विधिपूर्वक जप करता है तो सभी प्रकार के मुकदमो और प्रतिष्टा पतन करने वाले जूठे दावों का तुरंत ही निराकरण होता है |
Pavan Tanay Bal Pavan Samana | Budhi Bibek Bigyan Nidhana ||
मंत्र जाप विधि :- इस मंत्र को मंगलवार या शनिवार को पूर्व या उत्तर में मुख करके जाप करना चाहिए या मंत्र सिद्ध कर लेना चाहिए | और भगवान राम में पूर्ण आस्था रखते हुए अगर कोई भक्त इस मंत्र का जाप करता है तो इससे वह सभी प्रकार कि आपदाओं से मुक्त हो जाता है | और सभी प्रकार के मुकदमों में विजयश्री हासिल करता है | तभी तो प्रभु के लिए कहा जाता है :-
आज इस धर्म और अधर्म के कल्पित संसार में कई लोग अभी भी भगवान को ही सर्वशक्तिमान मानते है और मानना भी चाहिए क्योकि इस बात में किंचितमात्र भी संदेह नहीं है कि भगवान ही सर्वशक्तिमान है | तथा जो यह मानते है और कहते है कि भगवान नहीं है तो ऐसे मूर्ख और नाराधामी लोगों का जीवन पशु सामान है जो देख और महसूस तो कर पा रहे है पर उस शक्ति-स्वरूप परमात्मा का गुणगान नहीं कर पाते है, तथा इस कलियुग के मायाजाल में बुरी तरह से फंसकर अपना यह जीवन तो नष्ट कर ही रहे है साथ ही साथ परलोक को भी कष्टमय बना रहे है |
अत: मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि मानव जीवन कई भागों में विभजित है जहाँ मनुष्य को भोग-योग तथा धर्म-कर्म आदि पर विचारकर ही आगे कदम बढ़ाना चाहिए| यद्यपि हमें इस गृहस्थ जीवन से मोह तो होता ही है, परन्तु गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी निष्टावान और प्रभु उपासक बना जा सकता है |
हमें मनोकामना और वर प्राप्ति तथा मनवांछित फल पाने के लिए परमात्मा से अनुरोध करना चाहिए कि :- हे परमपिता परमेश्वर मुझ तुच्छ भक्त पर कृपा करे तथा मेरी मनोकामनाओं को पूर्ण करे |
रामचरितमानस में इस प्रकार कि भक्ति का बड़ा ही सुन्दर वर्णन देखने को मिलता है, जहाँ पर माता सीता कि भक्ति और समर्पणभाव से माता गौरी और देवर्षि नारद जी प्रसन्न हो जाते है और उनकी मनोकामना कि पूर्ति का आश्वाशन देते है | रामचरितमानस में दिए गए इस मंत्र को सिद्ध मंत्रो की श्रेणी में रखा जाता है | यह मंत्र वर प्राप्ति हेतु भी अग्रणी माना जाता है | रामचरितमानस में दिए दृष्टान्त के अनुसार आतिथ्य सत्कार करने से प्रसन्न हो नारद जी ने सीता माता को इसी प्रकार से आशीवाद दिया था तथा माता सीता द्वारा दुर्गा (माँ गौरी) की पूजा करने पर माता गौरी ने उन्हें इस प्रकार आशीर्वाद दिया |
In Hindi:-
सुनुसिय सत्य असीस हमारी |
पूजहिं मनोकामना तुम्हारी ||
In English:-
Sunu Siya Satya Ashisa Hamari |
Pujahin Mano Kamana Tumhari ||
भावार्थ:- यह मंत्र रामचरितमानस के बालकाण्ड से उदृत है तथा इसमें माता पार्वती जी की पूजा करने पर माँ गौरी अर्थात माता पार्वती प्रसन्न होकर माता सीता से कहती है कि, हे सीता तुम्हारी भक्ति और सेवा निष्काम है तथा तुम्हारे विचार अति उत्तम है अत: हे जनकनंदिनी तुम्हारी मनोकामना अवश्य पूर्ण होगी और जो तुम्हे श्रृद्धा भाव से पूजेगा, उसकी मनोकामना भी निसंदेह पूर्ण होगी |
मंत्र जाप विधि:- यह मंत्र रामचरितमानस के सिद्ध मन्त्रों में से एक है और गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्रीराम शलाका में भी मनोरथ सिद्धि के लिए इस मंत्र का उल्लेख किया है | इस मंत्र का जाप करने से पूर्व दस मिनट तक एकाग्रचित्त होकर भगवान श्रीराम और माता सीता का ध्यान करना चाहिए तथा उसके बाद ही इस मंत्र का जप आरंभ करें | मंत्र को प्रतिदिन संध्याकाल में कम से कम 108 बार जपना चाहिए | या हवन कर मंत्र की सिद्धि कर लेनी चाहिए | ऐसा करने से आपकी मनोकामना अवश्य ही सफल होती है |
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गायत्री मंत्र के प्रयोग से लाभ तथा प्रभावकारी विधान
Gayatri Mantra
वैसे तो गायत्री मंत्र को महा मंत्र माना गया है, पर इसे बीज मंत्र भी कहा जाता है और इसके जाप और पूजन का एक अलग विधान होता है | गायत्री मंत्र का जाप करने वाले को उसके जीवनकाल में कभी भी विपत्तियों से सामना नहीं करना पडता है और उसकी सभी मनोकामनाएं भी पूर्ण हो जाती है ऐसा शास्त्र कहते है | पर मैं उन्हीं शास्त्रोंनुसार कुछ फलदायी प्रयोग आपके सम्मुख प्रकट कर रहा हूँ |
"श्री" लक्ष्मी प्राप्ति हेतु प्रयोग (Mantra for Obtaining Property):- श्री प्राप्ति हेतु बिल्व वृक्ष की लकड़ी (समिधा) से सात दिनों तक गायत्री मंत्र की प्रतिदिन दो सौ आहुतियाँ करने वाला साधक "श्री" अर्थात लक्ष्मी प्राप्त करता है, और सवभाव से अति चंचल और एक जगह स्थिर न रहने वाली माता लक्ष्मी उस साधक के घर निवास करती है |
अपमृत्यु तथा भयनाश हेतु (Mantra for Unnatural death & destroy the fear):- शमी की समिधा अर्थात लकड़ी, अन्न, क्षीर और घी से प्रतिदिन सात दिनों तक गायत्री मंत्र की सौ-सौ आहुतियाँ देने से सभी प्रकार का भय दूर होता है |
मृत्यु भय से मुक्ति हेतु (Mantra to get rid from fear of death):- इसके लिए साधक को केवल दूध पीकर गायत्री मंत्र का श्रृद्धा एवं भक्तिपूर्वक एक सप्ताह तक जाप करने से, मृत्यु भय से मुक्ति मिलती है और साथ ही मंत्र शक्ति से वह कितना भी पापी रहा हो यमलोक में नहीं जाता है अर्थात मंत्र के पुण्य प्रभाव से वह यम पाश से मुक्त हो जाता है |
विजय प्राप्ति हेतु(Mantra to obtaining Victory):- विजय कि प्राप्ति के लिए साधक को मदार कि लकड़ी से गायत्री मंत्र का हवन करना चाहिए, इस प्रकार करने से वह सभी क्षेत्रों में विजय होता है |
दीर्घायु होने के लिए(Mantra for long life):- लंबी आयु अर्थात दीर्घायु होने के लिए पलाश के अग्रभाग वाली लकड़ी से गायत्री मंत्र का हवन करने से साधक को दीर्घायु की प्राप्ति होती है |
मनवांछित पुत्र की प्राप्ति के लिए(Mantra to achieve the best son):- मनचाहा पुत्र प्राप्ति के लिए गायत्री मन्त्रों के साथ खीर का हवन करे तथा इस खीर को सूर्य देव को अर्पण कर ऋतुस्नाता ब्राहमणी को भोजन करावें | इस प्रकार करने से आपको श्रेष्ठ पुत्र कि प्राप्ति होगी |
सिद्धियाँ प्राप्ति हेतु(Mantra to achieve perfection):- जो मनुष्य तथा साधक लगातार पांच वर्षों तक पूर्ण श्रृद्धा तथा भक्तिभाव से गायत्री मंत्र का जाप करता है, उसे आठों सिद्धियों कि प्राप्ति होना निश्चित है |
ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्ति(To get rid from brahm Murder):- जिन लोगों को ब्रह्म हत्या का पाप भूलवश या जाने-अनजाने कैसे भी लगा हो, ऐसे मनुष्यों को चाहिए कि वह किसी विद्वान ब्राह्मण को बुलाकर तीन हजार बार गायत्री मंत्र का जाप तथा हवन कराये, इस प्रकार उन्हें ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्ति मिलेगी |
गो हत्या के पाप से मुक्ति(To get rid from cow slaughter):- गो-हत्या या गो-वध सबसे बड़ा अधर्म और पाप माना गया है, और इसके लिए कोई भी सजा बहुत तुच्छ होगी, पर शास्त्रानुसार इस पाप से मुक्ति के लिए बारह दिनों तक प्रतिदिन तीन-तीन हजार गायत्री मन्त्रों का जाप तथा हवन करे |
अनिष्ट (कष्ट- विपत्ति- आपदा) निवारण हेतु गायत्री मंत्र का प्रयोग
ग्रह शांति हेतु(Mantra for peace of the Planet):- ग्रह शांति के लिए दूध की लकड़ी से एक हजार (1000) गायत्री मंत्रो का जाप करके हवन करने से सभी तरह के ग्रहों कि शांति होती है | तथा दूध की लकड़ी के बजाय शमी कि लकड़ी हो तो उसे अति उत्तम माना गया है, इस प्रकार हवन तथा पाठ करने से आपके सभी प्रकार के भौतिक रोग और व्याधि नष्ट हो जाते है और साथ ही साथ सभी ग्रह भी भगवती गायत्री की कृपा से शांत हो जाते है |
Bhagawati Gayatri
परम शांति के लिए(Mantra for ultimate peace):- परम शांति के लिए पीपल, पाकड़, गूलर और वट की समिधाओं (लकड़ी) से गायत्री मंत्र का हवन करने के पश्चात हाथ में जल लेकर भगवान सूर्य को तर्पण करना चाहिए, इस प्रकार से आपको परम शांति कि प्राप्ति होती है |
विष का प्रभाव नष्ट करने के लिए(Mantra for destroy the toxin):- गायत्री मन्त्र अक जाप करते हुए कुश का स्पर्श करने से माता गायत्री की कृपा फलस्वरूप विष का प्रभाव कम हो जाता है |
मिर्गी रोग से मुक्ति के लिए(Mantra to cure epilepsy ):- मिर्गी रोग से मुक्ति पाने के लिए अपामार्ग के बीजों से गायत्री माता का एक हजार मन्त्रों से हवन करे |
चेचक रोग से शांति हेतु(Mantra to cure smallpox):- दूध, दही तथा घृत से प्रिटिं गयात्रो मंत्र का एक सौ आठ बार हवन करने से चेचक रोग शांत हो जाता है और पीड़ा नहीं रहती है |
कुष्ठ रोग निवारण हेतु(Mantra for leprosy prevention):- कुष्ठ रोग के लिए सोमलता कि गाँठ को अलग-अलग करके दूध में डाले, और अमावस्या के दिन गायत्री मन्त्र से हवन करने से कुष्ठ रोग में आशातीत लाभ होता है |
सभी व्याधियो के नाश हेतु(Mantra to cure all diseases):- गुरूच को खंड-खंड करके दूध में भिगोने के पश्चात अग्नि में आहुति देवे, तथा भक्तिपूर्वक गायत्री मंत्र का ध्यान करे | इस प्रकार हवन करने से समस्त व्याधियो का नाश होता है |
भगवती माता गायत्री कि कृपा से सभी प्रकार कि आपदा और व्याधियों से छुटकारा मिलता है इसमें कोई संदेह नहीं है, बस आवश्यकता है तो श्रृद्धा, प्रेम और समर्पण की, यदि कोई भक्त पूर्ण श्रृद्धा और प्रेम से माता गायत्री के मन्त्रों का जाप करता है तो वह निश्चय ही परम सुखी और माता की कृपा का पात्र होता है |
इस निखिल विश्व में विद्या के समान दिव्य नेत्र नहीं है ,सत्य के समान किसी प्रकार का तप नही है क्रोध के समान कोई दुःख नही है और नही है त्याग के समान कोई परम सुख | वस्तुत: विधा की उपलब्धि से मानव ज्ञान पुंज का संचय कर सत्कर्म में अभिरत हो परमात्म सुख की अनुभूति करता है| “ विद्यया अमृतमश्नुते ” यह उपनिषद का महा वाक्य इसी का प्रतिपादन करता है इसी प्रकार सत्य पालन से प्राणी सत्य स्वरूप भगवान श्री सर्वेश्वर के अनिर्वचनीय दर्शन कर अपरिमित आनंद सुधारस का पान कर परम तृप्त होता है | “सत्यं वद” | यह वेद का उद्गोष इसलिय पुनः संसार को सचेत एवं सावधान करता है |
क्रोध प्राणी मात्र का सबसे बड़ा शत्रु है ,इससे सभी विवेकहीन होकर अकरणीय अत्यंत नीच कर्म के करने में भी नही हिचकिचाते |इसी से तो श्रीमद्भगवद्गीता में सर्वनियन्ता भगवान सर्वेश्वर श्री श्यामसुन्दर ने अर्जुन को उपदेश करते हुये आज्ञा दी है |
अर्थात क्रोध से मोह की उत्पति और मोह से बुद्धि का हास और बुद्धि के ह्रास से प्राणी विनाश को प्राप्त हो जाता है
अत: मानव के तीन शत्रु दिखते नहीं है, परन्तु बहुत शक्तिशाली होते है, इनको परित्याग करके ही मानव अपना कल्याण करता है |
अहंकारं बलं दर्प कामं क्रोधो परिग्रहम् |
विमुच्य निर्मम शान्तो ब्रह्म भुयाय कल्पते ||
(भगवद्गीता श्लोक)
यह मार्मिक उपदेश कर स्पष्ट ही संकेत किया है कि अहंकार , बल, दर्प, घमंड ,काम, [सांसारिक इच्छाएँ] क्रोध और परिग्रह [संग्रह का त्याग ] करने पर प्राणी अनासक्त शांत होकर परब्रह्म परमात्मा श्री कृष्ण को प्राप्त कर सकता है अतः यह महाभारत का विवेक चतुष्टय परम कल्याणकारी और नितांत आवश्यक है इसका मनन करने से इन आंतरिक शत्रु पर विजय प्राप्त कर संतोष सुख को प्राप्तकरता है, इसी में हित सन्निहित है |
मानव जीवन की सफलता के संदर्भ में महाकवि तुलसीदास जी ने श्री रामचरितमानस में लिखा है कि:-
चौपाई(1):-
बड़े भाग्य मानस तनु पावा !
सुर दुर्लभ सद ग्रन्थन गावा !!
चौपाई(2):-
साधन धाम मोक्षकर द्वारा !
पायन जो परलोक संवारा !!
चौपाई(3):-
नर तनु पाय विषय मन देही !
पलटी सुधा ते नर विष लेही !!
चौपाई(4):-
जो न तरहि भाव सागर, नर समाज अस पाय !
सो कृत निंदक मंद मति, आतम हनि गति जाय !!
भावार्थ:- अर्थात जीव को बड़े भाग्य से, कितने ही जन्मों के पुन्यकर्मो के फलस्वरूप मनुष्य जीवन मिलता है! अत: इसको व्यर्थ ही गवाना नही चाहिए, इस जीवन को प्रभु के चरणों में अर्पित करना चाहिए ! और जो भगवत्कृपा से ऐसे मनुष्य शरीर को पाकर संसार सागर से पार होने का प्रयास नहीं करता है, वह घोर निंदक मंदमति आत्म हत्यारों कि गति प्राप्त करता है ! जिसके लिए उपनिषदों में कहा गया है:-
असूर्या: नामते लोका: अन्धेन तमसा बृता: !
तान्स्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्म हनो जना: !!
रामचरितमानस के इस मंत्र से खोई हुयी चीज या प्रिय वस्तु श्री राम प्रभु की कृपा से शीघ्र ही मिल जाती है अत: जिन व्यक्तियों के किसी भी वस्तु या प्रियजनों का पता नहीं लग पा रहा हो उन्हें इस मंत्र का प्रयोग अवश्य कारण चाहिए | तथा श्री राम में श्रृद्धा और भक्तिभाव रखते हुए इस परम सिद्ध मंत्र का कम से कम 108 बार जाप अवश्य करे | जिससे कि श्री राम जी कि कृपा हो तथा आपकी खोई हुयी वस्तु आपको प्राप्त हो | इस मंत्र जाप प्रात: और संध्याकाल में तब तक करे जब तक आपकी खोई हुयी वस्तु मिल नहीं जाती |
मंत्र इस प्रकार से है :-
In Hindi:-
गई बहोर गरीब नेवाजू | सरल सबल साहिब रघुराजू ||
In English:-
Gai Bahor Garib Nevaju | Saral Sabal Sahib Raghuraju ||
This mantra’s from the Ramcharitmanas. You can use this mantra when you want to get back your lost things or item, but before it you have to jaap this mantra daily at least 21 times. And jaap this mantra regularly to get peaceful life.
खोई हुयी वस्तु प्राप्त करने का मंत्र (2):-
Raja Kartviryaarjuna
हैहयवंशी राजा कार्तवीर्यार्जुन जो भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्रावतार माने जाते है | किसी भी वस्तु या प्रिय चीज के खो जाने पर, इनकी पूजा करनी चाहिए तथा राजा कार्तवीर्यार्जुन को साधना द्वारा प्रसन्न करना चाहिए जिससे कि इस प्रकार की आपदा का तुरंत ही समाधान होता है | क्योकि वे सुदर्शनावतार होने के कारण उनकी पहुँच सम्पूर्ण लोकों तक है अत: शास्त्रों के अनुसार वह सभी लोकों में जाकर खोई हुयी वस्तु या व्यक्ति सभी को ढूंढकर लाने में समर्थ है |
पूजा विधान:- प्रात: काल और संध्याकाल में स्नानादि से निवृत होकर शुद्ध आसन पर विराजमान होकर पूर्व या उत्तर दिशा में मुंह करके, घी का दीपक जलाकर पूर्ण श्रृद्धा से भगवान विष्णु के सुदर्शनावतार या सुदर्शन चक्र का ध्यान करते हुए निम्नलिखित मंत्र का 108 (एक माला) बार जाप करे | साधक कितनी भी माला का जाप कर सकता है, यह साधक पर निर्भर करता है |
मंत्र इस प्रकार से है :- In Hindi:-
ऊँ ह्रीं कार्तवीर्यार्जुनोनाम राजा बाहू सहस्त्रवान् |
तस्य नाम स्मरणमात्रेण गतं नष्टं च लभ्यते ||
In English:-
Ohm Hrim Kartviryaarjunonam Raja Bahu Sahastravan |
Tasya Naam Smranmatren Gatam Nashtam Cha Labhyate ||
महाशिवरात्रि हिन्दुओं के प्रमुख त्योहारों में से एक है | यह पर्व भगवान शिवशंकर का पूजन कर मनाया जाता है | भगवान शिव को सभी देवों का देव कहा गया है इसलिए इनको महादेव भी कहा जाता है |
महाशिवरात्रि का त्यौहार फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को मनाया जाता है। शास्त्रों के अनुसार सृष्टि के प्रारंभ में इसी दिन मध्यरात्रि को भगवान् शंकर का ब्रह्मा से रुद्र के रूप में अवतरण हुआ था | तथा प्रलय की वेला में इसी दिन प्रदोष के समय भगवान शिव तांडव करते हुए ब्रह्मांड को तीसरे नेत्र की ज्वाला से भस्म कर देते हैं |
इसीलिए इस दिन को महाशिवरात्रि अथवा कालरात्रि कहा गया। भगवान भोलेनाथ सदैव माता पार्वती तथा शिव प्रेतों व पिशाचों के साथ रहते है |
शिव का रूप सभी देवो से अलग है | शरीर पर भस्म, गले में सर्पों का हार, कंठ में विष, जटाओं में पतित पावनी गंगा मैया तथा मस्तक पर चंद्र कि छटा विराजित रहती है |
महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर शिवभक्त शिव मंदिरों में जाकर शिवलिंग पर बिल्वपत्र तथा आक के फूल जो आदिनाथ को अत्यंत प्रिय है उनको अर्पित करते हैं, तथा शिव का पूजन करते है और उपवास करते हुए रात्रि को जागरण करते हैं | इस दिन शिवलिंग पर बिल्वपत्र तथा आक के फूल चढाना और पूजन करना हिंदू पौराणिक संस्कृति कि परम्परा का जीता-जगाता उदाहरण है | तथा भक्तो की आस्था का प्रतीक है |
महाशिवरात्रि पर्व विशेष:-
इस पर्व को उत्साह और श्रृद्धा से मनाने का करना यह भी है कि इस दिन महादेव शिव की शादी हुई थी इसलिए इस दिन रात्रि में शिवजी की बारात निकाली जाती है। वास्तव में शिवरात्रि का परम पर्व स्वयं परमपिता परमात्मा के सृष्टि पर अवतरित होने की याद को मानस पटल पर जीवन्त करता है | परमपिता परमात्मा ही ज्ञान के सागर है जो जीव-मात्र को सत्यज्ञान (सत्) द्वारा अन्धकार (तम) से प्रकाश की ओर अथवा असत्य से सत्य की ओर ले जाते हैं | इस दिन सभी जाति, धर्मों तथा वर्णों के मनुष्यों को इन मापदंडो से ऊपर उठाकर भगवान भोलेनाथ का व्रत करते हुए पूर्ण श्रृद्धा से पूजन करना चाहिए |
पूजन विधान:-
महाशिवरात्रि के दिन मिट्टी के बर्तन में पानी भरकर, ऊपर से बिल्वपत्र, आक धतूरे के पुष्प, चावल आदि डालकर शिवलिंग पर चढ़ाया जाता है तथा उनका पूजन किया जाता है | अगर नजदीक में शिवालय या शिवमंदिर न हो तो घर पर ही शुद्ध गीली मिट्टी से ही शिवलिंग बनाकर उसका विधि पूर्वक पूजन करना उत्तम माना गया है | इस दिन सुबह प्रात:काल में ही नित्य-कर्मों से निवृत होकर भगवान शिव कि आराधना “ऊं नमः शिवाय” मंत्र से सुरु करते हुए पूरे दिन इसी मंत्र का बारम्बार जाप करते रहना चाहिए | इस मंत्र में वह शक्ति है जो किसी अन्य मंत्र में नहीं है अत: श्रृद्धालुओं को चाहिए कि वह शिव पूजन करते समय अधिकाधिक इस मंत्र का जाप करें तथा भगवान भोलेनाथ कि कृपानुभूति प्राप्त करें | तथा इस दिन शिवमहापुराण और रुद्राष्टकम आदि का पाठ अति उत्तम माना जाता है |
महाशिवरात्रि भगवान शंकर का सबसे पवित्र दिन है। इस दिन महाशिव का पूजन तथा स्तुति करने से सब पापों का नाश हो जाता है। तथा मनुष्य के जीवन को नयी दिशा मिल जाती है | ईशान संहिता में महाशिवरात्रि कि महिमा को इस प्रकार बताया गया है:-
शिवरात्रि व्रतं नाम सर्वपापं प्रणाशनम् | आचाण्डाल मनुष्याणं भुक्ति मुक्ति प्रदायकं ||
एक बार माता पार्वती के ने पूछा कि हे प्रभु आपके भक्तो के लिए आपका अति उत्तम और प्रिय दिन कौनसा है तो महादेव ने उत्तर देते हुए कहा कि फाल्गुन माह कि कृष्ण चतुर्दशी मुझे अत्यंत प्रिय है तथा इस दिन जो भी भक्त मुझ में पूर्ण श्रृद्धा रखते हुए मेरा पूजन करेगा वह मुझे अत्यंत प्रिय होगा तथा उसके कभी भी सुख सम्पदा का आभाव नहीं होगा अत: चतुर्दशी तिथि के स्वामी शिव हैं |
अत: ज्योतिष शास्त्रों में इसे परम शुभफलदायी कहा गया है, वैसे तो शिवरात्रि हर महीने में आती है | परंतु फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को ही महाशिवरात्रि कहा गया है |
ज्योतिषीय गणना के अनुसार सूर्य-देव भी इस दिन तक उत्तरायण में प्रवेश कर चुके होते हैं तथा ऋतु परिवर्तन का यह समय अत्यन्त शुभ कहा गया हैं। शिव का अर्थ है कल्याण। शिव सबका कल्याण करने वाले हैं। तभी तो कहा जाता है कि “सत्यम शिवम सुन्दरम” अर्थात सत्य ही शिव है और शिव ही सुन्दर है |
ज्योतिषीय गणित के अनुसार चतुर्दशी तिथि को चंद्रमा अपनी क्षीणस्थ अवस्था में पहुंच जाते हैं। जिस कारण बलहीन चंद्रमा सृष्टि को ऊर्जा देने में असमर्थ हो जाते हैं। चंद्रमा का सीधा संबंध मन से कहा गया है। मन कमजोर होने पर भौतिक संताप प्राणी को घेर लेते हैं तथा विषाद की स्थिति उत्पन्न होती है। इससे कष्टों का सामना करना पड़ता है।
चंद्रमा भगवान शिव के मस्तक पर सुशोभित है | अत: चंद्रदेव की कृपा प्राप्त करने के लिए भगवान शिव कि शरण में जाना पडता है | और महाशिवरात्रि शिव की प्रिय तिथि है | अत: सभी ज्योतिषी शिवरात्रि को शिव आराधना कर सभी प्रकार के कष्टों से मुक्ति पाने का एकमात्र रास्ता मानते है | शिव आदि-अनादि है भगवान भोले तो अनंत है | सृष्टि के विनाश व पुन:स्थापन के बीच की कड़ी है | प्रलय यानी कष्ट, पुन:स्थापन यानी सुख | अत: ज्योतिष में शिव को सुखों का आधार मान कर महाशिवरात्रि पर अनेक प्रकार के अनुष्ठान करने की महत्ता कही गई है।
महाशिवरात्रि के दिन शुभ समय में पारद शिवलिंग को प्राण प्रतिष्ठित करवाकर स्थापित करने से व्यवसाय में वृद्धि व नौकरी में तरक्की मिलती है तथा इस प्रयोग से मानसिक तथा आद्यात्मिक सुखो में वृद्धि होती है |
किसी भी प्रकार कि बाधा नाश हेतु:-
शिवरात्रि के प्रदोष काल में स्फटिक शिवलिंग को शुद्ध गंगा जल, दूध, दही, घी, शहद व शक्कर से स्नान करवाकर धूप-दीप जलाकर निम्न मंत्र का जाप करने से समस्त बाधाओं का नाश होता है | इस शिव गायत्री मंत्र कि हवन में कम से कम १०८ बार आहुतियाँ अवश्य देवें |
शिव मंदिर में शिव-लिंग पूजन कर महामृत्युंजय मंत्र के दस हज़ार मंत्रों का जाप करने से प्राण रक्षा होती है। महामृत्युंजय मंत्र का जाप रुद्राक्ष की माला पर करें।
शिवरात्रि को रूद्राष्टकम का पाठ २१ बार करने से शत्रुओं से मुक्ति मिलती है। मुक़दमे में जीत व समस्त सुखों की प्राप्ति होती है।
मोक्ष की प्राप्ति हेतु:-
शिवरात्रि को एक मुखी रूद्राक्ष को गंगाजल से स्नान करवाकर धूप-दीप दिखा कर तख्ते पर स्वच्छ कपड़ा बिछाकर स्थापित करें। शिव रूप रूद्राक्ष के सामने बैठ कर “ॐ नम: शिवाय” के सवा लाख मंत्र जप का संकल्प लेकर जाप आरंभ करें। जप शिवरात्रि के बाद भी जारी रखना चाहिए |
मानव का मन महान शक्तियों का बहुत बड़ा भंडार है( Dynamo of Creative Energy) | एक से बढकर एक शक्तिया इसमें निवास करती है | छोटे, बड़े, विद्वान और मुर्ख सभी को बीज रूप में परमात्मा ने यह शक्तिया दी है | जो मानव इनको जाग्रत करके इनका उपयोग करते है वो महामानव बनते है | अगर मूर्ख से मूर्ख व्यक्ति भी इनको जाग्रत करे तो वो भी बुद्धिमान बन जाता है | इनको जाग्रत करके बड़े चमत्कार किये जा सकते है | असंभव दिखने वाले कार्यों को भी सहजता से किया जा सकता है |मानसिक शक्तियों का प्रदर्शन परिपुष्ट मष्तिष्क द्वारा ही किया जा सकता है | उत्तम मष्तिस्क द्वारा ही मन अपने अदभुद सामर्थ्य का प्रदर्शन कर सकता है | आप मष्तिष्क को केवल एक अतिसूक्ष्म यंत्र या डायनेमाँ समझ लीजिए | बिजली पैदा करने वाले डायनेमाँ के भाति मष्तिष्क विचार उत्पन्न करता है |हमारे मष्तिष्क के विभिन्न भागो में भिन्न भिन्न शक्तियों के सूक्ष्म केंद्र है | कुछ शक्तियों का केन्द्र मष्तिष्क के अग्र भाग में और कुछ का मध्य भाग में और कुछ का पृष्ठ भाग में है | मष्तिष्क के जिस भाग में यह शक्तियां निवास करती है उस भाग में स्थित कोषो(Cells) की संख्या के परिणाम में यह शक्तियां कम या ज्यादा होती है |सेल्स की संख्या को बढ़ाने हेतु मष्तिष्क के उस भाग पर ध्यान करे व भावना करे की शरीर की सारी शक्ति उस भाग को उन्नत कर रही है | रक्त संचार उस भाग में ज्यादा हो रहा है ऐसी भावना करने से मष्तिष्क के उस भाग की कोशिकाए सक्रीय हो जायगी व उस भाग से सम्भदित शक्तियों का विकास होने लगेगा | मस्तिष्क के जो भाग निक्कमे छोड़ दिए जाने के कारण निष्क्रिय हो जाते है उन्हें भी इस प्रकार जाग्रत किया जा सकता है | मष्तिष्क को शक्तिशाली बनाने के लिए तीन चीजे जरुरी हैं :
1. उत्तम व पूर्ण परिपुष्ट मष्तिष्क
2. मानसिक शक्तियों का यथार्थ ज्ञान
3. मानसिक शक्तियों का पोषण और संचय
1. भक्तिभाव पूजाभाव श्रृद्धा भाव शक्तियों का केन्द्र मष्तिष्क मुर्धन्य है | जिन लोगोकी मूर्धा में यह कोष कम होते है उन लोगो में गुरुजनों व् ईश्वर में विश्वास कम रहता है |
2. जो शक्तियां कपाल के निचे अर्ध भाग में निवास करती है, वे विद्या कला खोज से सम्बन्धित है जिनमे यह विकसित होती है वे लोग निरर्थक बाते नहीं करते है व्यवस्था पूर्वक कार्ये करते है | किसी कार्ये को एक बार हाथमे लेकर छोड़ते नहीं बल्कि पूरा करते है | यद्धपि उनमे तर्क वितर्क करने की क्षमता नहीं होती, किन्तु फल प्राप्त करने की सामर्थ्ये रखते है | यदि आप इन शक्तियों को बढ़ाना चाहते है तो आप कपाल के निचे अग्र भाग के कोशो की वृद्धि करे, आप अपनी चित्तवृति मस्तिष्क के मध्य बिंदु पर एकाग्र करे | निरंतर सोचने से उस भाग मे कोशो की वृद्धि होगी और वो भाग पुष्ट होने से इन शक्तियों का विकास होगा |
3. कपाल के ऊपरी आधे भाग में बुद्धि की शक्तिया अपना कार्य करती है | इस भाग का विकास करने के लिए मस्तिष्क के मध्य बिंदु पर एकाग्र कीजिए | निरंतर सोचने से उस भाग में रुधिर की गति बढ़ेगी व एकाग्रता से वह भाग पुष्ट होने लगेगा कपाल के ऊपरी आधे भाग में बुद्धि की अपनी शक्तियां काम करती है | इस भाग का विकास करने के लिए मस्तिष्क के मध्य बिंदु से कपाल के ऊपर के अर्द्ध भाग तक रहने वाले सूक्ष्म द्रव्यों पर एकाग्रता करनी चाहिए | इस भाग के कोशो की वृद्धि से बुद्धि की शक्ति बढती है और विषयो को समझने की शक्ति में वृद्धि होती है | नित्य अभ्यास से उसकी शक्ति इतनी बढ़ जाती है की व्यक्ति जिस विषय पर सोचता है उस विषय पर आर से पार सोच सकता है |
4.. कान के छिद्र के आगे से सिर की चोटी तक एक खड़ी सीधी रेखा खीचिये जहा पर इसका अंत होगा उसके ठीक पीछे के भाग में श्रद्धा, दृढ़ता ,आत्मबल और विश्वाश आदि दिव्य शक्तियां निवास करती है | इन पर एकाग्रता करने से यदि कोष कम होंगे तो अधिक हो जायेंगे |दुर्बल होंगे तो सबल हो जायेंगे | और बलवान होंगे तो और बलवान हो जाएंगे |
5. मस्तिस्क के निचे, पीछे के भाग में प्रयास करने से सामर्थ्य शक्ति बढती है | जिस व्यक्ति में यह शक्ति विकसित अवस्था में होती है वो किसी काम को करने से पीछे नहीं हटता वो किसी भी काम को कठिन समझ कर यो ही नहीं छोड़ता क्योंकि उसे लगातार मस्तिष्क के उस भाग से सहारा मिलता है |
6. कपाल के ऊपर के भाग के भाग में जहा अंदर से बलों की जड़े शुरू होती है यह ज्ञान है की कब किस मौके पर क्या करना चाहिए ! इस निरीक्षण शक्ति को जाग्रत करने के लिए पूर्व कथनानुसार एकाग्रता करके वह के कोशो को परिपूर्ण और पुस्त करना चाहिए कठिन से कठिन गुत्थी भी इस क्रिया शक्ति से आसानी से सुलझाई जा सकती है
7. मष्तिस्क की बीच की सतह से नाडीयो के 12 जोड़े निकलते है प्रत्येक जोड़ी शरीर को कुछ न कुछ ज्ञान देता है, ये नाडीया गर्दन को विशेष सन्देश भेजती है जिससे हमें कुछ न कुछ नवीन बात मालूम होती है इच्छा शक्ति का यथार्थ स्थान कहा है इसका उत्तर ओ ह्ष्णुहारा नमक लेखिका ने अपनी पुस्तक (concentration and the acquirement of personal magnetism ) में इस प्रकार दिया है :–
मेरी सम्मति में इच्छा अथवा संकल्प शक्ति का स्थित स्थान नाडीयो के उस तेजस्क ओज के भीतर निश्चित किया जासकता है जो मष्तिष्क को चारो और से घेरे हुए है अत: संकल्प शक्ति के विकाश के लिए यहाँ के कोसो की वृद्धि कीजिये |
मष्तिष्क के विभिन्न कोशो पर एकाग्रता करने परसे हमारे रुधिर की गति उस और होने लगती है और उनकी संख्या में वृद्धि और विकाश होता है |कोई भी कोष हो बढ़ाने जरुरी है यदि ये सब बढे तो उत्तम है अत: किसी विशेष भाग के कोष बढावे ऐसा न सोचकर इस भावना पर मन एकाग्र करे की हमारे मष्तिष्क के सब कोष निरंतर बढ़ रहे है हमारी निरीक्षण शक्ति, तुलना शक्ती, न्याय शक्ती,विवेक शक्ति, संकल्प शक्ती सभी को बढा रहे है | यह भाव मात्र उपरी दिखावा मात्र नहीं होकर पूर्ण अनुभूति युक्त होना चाहिए उस समय अपनी कल्पना द्वारा वैसा ही अनुभव करना चाहिए | साधको को प्रारंभ में आत्म स्वरुप की भावना करनी कभी नहीं भूलनी चाहिए |
कोशो की वृद्धि की क्रिया जमींन जोतकर करने के समान है| जिस प्रकार उत्तम रीति से जोते हुए खेत में बीज अच्छे उगते है उसी प्रकार के कोष वाले मष्तिष्क में मानसिक शक्तिया उत्तम रीति से विकसित होती है इसलिए जिस प्रकार की शक्ति को हम विकसित करना चाहते है उसका यथार्थ रूप हमारे लक्ष्य में रहना अनिवार्य है ध्याता में ध्यान करने की वस्तु के स्वरुप की यथार्थ कल्पना अत्यंत आवश्यक है योग शास्त्र का यह अखंडनीय सिद्धांत है ध्यान करने वाला जिसका ध्यान करता है उसी के सामान हो जाता है | अत: मानसिक शक्तियों का विकाश करने वाले जिस शक्ति का विकाश करना हो उसके स्वरुप को अच्छी तरह लक्ष्य में रखना चाहिए |
कल्पना कीजिये की हम अपने अंदर श्रृद्धा भक्ति भाव अंतर्ज्ञान इत्यादि आध्यात्मिक शक्तियां का विकाश करना चाहते है | इन शक्तिय्यो के जाग्रत और विकसित होने का स्थान मूर्धा और इसके नीचे का प्रदेश है | इन स्थानो मे एकाग्रता करते समय हम सच्ची भक्ति सच्ची श्रृद्धा और अंतर्ज्ञान के जिस नमूने को सामने रखेंगे वही इसमें क्रमश: प्रगट होने लगेगा | अत: जिस शक्ति के विकाश का हमने निश्चय किया है , उसके ऊँचे से ऊँचे स्वरुप की, जहा तक हमारी बुद्धि पहुच सके वहीतक कल्पना करनी चाहिए और उस कल्पना में व्रती को आरूढ़ करके पूर्वोक्त क्रिया श्रृद्धा पूर्वक करनी चाहिए| इससे मष्तिष्क के कोष बढ़ेंगे शुद्ध होंगे और वह काल्पनिक शक्ति धीरे धीरे बढ़ने लगेगी |
तीसरी बात है सामर्थ्य की | मन जिस सामर्थ्य को परिपुष्ट होता है उस सामर्थ्य की वृद्धि करने की भी आवश्यकता है | प्रत्येक मनुष्ये में यह सामर्थ्य एक बड़े परिणाम में वस्तुत रहता है पर अधिकांश व्यक्ति इसका अधिकतर भाग निक्कमी क्रियाओं में यो ही नष्ट कर दिया करते है | बैठे बैठे पांव हिलाना , आँख नाक या गुप्तांग टटोलते रहना , सार रहित बाते सोचना, या यो ही बे मतलब की बाते करते रहना या सुपारी चबाते रहना आदि शरीर की निक्कमी क्रियाँए है | इनसे मन की सामर्थ्य शक्ति का ह्रास होता है क्रोध, चिंता, भय आदि विविध विकारों से तो सामर्थ्ये का बड़ा नाश होता है| जो दिन भर की आय होती है नाराजगी में बह जाती है| संचित सामर्थ्ये का भी ह्र्राश होता है | अत: मानसिक शक्तियों के इछुक को सब प्रकार के खस्यो ख्सयो से बचने की आवश्यकता है| मन पूरी शांत स्थिति में रहना अनिवार्य है| वाणी और शारीर के सब व्यर्थ प्रपंच छोड़कर मन को शांत स्थिति रखने का प्रयाश करना चाहिए इससे हमारा बल संचय होता है और हमें एक अद्भुत सामर्थ्य का अनुभव होता है | जिस संस्कारी व्यक्ति को इस बल का अनुभव हो उसे चाहिए की अपनी योग्य उचित वातावरण खोज ले और निरंतर मानशिक शक्तियों को पूर्वोक्त प्रकार से संचित करता रहे |
मानशिक शक्तियों की अभिवर्धि के लिए अनुकूल संगती और परिस्थितियों की परम आवश्यकता है | अपने उद्देश्य के अनुकूल उचित वातावरण उपस्थित करो | जिस वातावरण में मनुष्य रहता है वे ही मानसिक शक्तियां क्रमश: उत्पन्न और बढती हुई दिखाई देती है | जिस व्यक्ति के परिवार मे, मित्रो मे, मिलने झुलने वालो में कभी अधिक होते है , वे प्राय: कभी ही हो जाया करता है | सेनिको व सिपाहियों के कुल में रहने वाला व्यक्ति प्राय: निडर हो जाया करता है| तुम जिस प्रकार की मानसिक शक्तियों का उद्भव चाहते हो वैसे ही व्यक्तियों में रहो, वैसी ही पुस्तकों का अध्यन करो, वैसे ही मनुष्यों के चित्र देखो और निरंतर वैसे ही चिंतन में मग्न रहो अपने अभीष्ट की भावना पर मन को एकाग्र कर गंभीरता पूर्वक स्थिर करो | उपयुक्त वातावरण में रहने से मानसिक व्ययामसे भिन्न-भिन्न क्रियाओ के अभ्यास से, मन की शक्ति तीव्र हो जाती है |
This mantra is from Ramcharit Manas and this is based on the conversation between lord ram and shri parsuram in the mithila (janakpuri).
In the case of broken bow of lord shiva. Shri parasuram ji was highly angry on lord ram, then lord ram was explained to him about the situation in the simplest behavior. Because of this, it will be very useful for the interview.
This is a powerful mantras to get success in interviews. You has to be recited 108 times in a day to get effects of this mantra.
साक्षात्कार में सफलता के लिए ज्ञानी होने के साथ-साथ अच्छा वक्ता होना परम आवश्यक है | कई बार ऐसा होता है कि आप एक अच्छे जानकर होते है पर बोलने या उल्लेख (विस्तार से समझाना) करने में विफल रहते है, तो आपको दूसरों से कमतर आँका जाता है | अत: साक्षात्कार में सफलता के लिए यह आवश्यक है कि जो ज्ञान (जानकारी) या जो knowledge आप रखते है या बताते है उसको ऐसा Explain करे कि लोग आके बुद्धिमता कौशल की प्रसंसा करने लगे |
अर्थात कहने का तात्पर्य यह है कि बुद्धिमता के साथ तर्क और वक्तव्य का होना परम आवश्यक है | अच्छा वक्ता वही होता है जो अपने बुद्धिमता कौशल का दायरा परिसीमित रखता हुआ तर्कसंगत बात बोले और विवेकशीलता से उसे प्रकट करने का साहस रखे |
यहाँ हम साक्षात्कार में सफलता के संदर्भ में रामचरितमानस के अयोध्याकाण्ड के एक मंत्र के चर्चा करेंगे |
जनकपुरी में माता सीता के स्वयंवर में श्री राम जी के हाथों भगवान शिव का धनुष भंग होना, तथा शिव धनुष के भंग होने पर उसकी घनघोर गर्जना से परसुराम जी का क्रोधवश वहाँ आना तथा धनुष किसने भंग किया ऐसा पूछना आदि के अंतर्गत श्री राम और परसुराम जी के टकरावपूर्ण संवाद में श्री राम द्वारा परसुराम जी को मंत्रमुग्ध करना | इसमें श्री राम और भृगुकुल ऋषि परसुराम जी का वार्तालाप हुआ उसमे परसुराम जी अपने अधिष्ठाता और आराध्य देव भगवान शिव के धनुष भंग पर बड़े क्रोधित होकर श्री राम को मृत्युदंड देने के लिए तैयार थे पर प्रभु श्री राम ने बड़ी ही शालीनता, तन्मयता और सरल वाणी से परसुराम को अपना दर्शन कराया तथा उनके क्रोध को संत कर दिया |
अत: इस मंत्र का जो कोई भी भक्त श्रृद्धा-पूर्वक जाप करना है और प्रभु श्रीराम को समरण करता है, उसको प्रत्येक प्रकार के साक्षात्कार और शास्त्रार्थ में सफलता प्राप्त होती है | साक्षात्कार में सफलता के लिए मंत्र इस प्रकार है:-
Mantra:-
Tehi Awasar Suni Shiv Dhanu Bhanga |
Aayau Bhrigukul Kamal Patanga ||
तेहि अवसर सुनि सिव धनु भंगा।
आयउ भृगुकुल कमल पतंगा॥
भावार्थ:- यह चौपाई रामचरितमानस से शिव धनुष भंग होने व राम सीता के विवाह के संदर्भ में कही गयी है, जब भगवान राम के हाथ से शिव धनुष भंग होने पर भृगुकुल ऋषि परसुराम वहाँ अति क्रोध में आ गये व शिव धनुष भंग करने वाले को मृत्युदंड देने की बातें करने लगे तब भगवान राम ने उन्हें अपनी सरल वाणी व स्वाभाव से मुग्ध कर दिया ! इसका तात्पर्य यह है की इस चौपाई का निरंतर ध्यान करने वाले कभी भी किसी से वार्तालाप में हारते नही है और विचलित नही होते है |
इस मंत्र को प्रत्येक रोज 108 बार जप करे या कम से कम 21 बार संध्या समय में जप करने से आपकी मनोकामना पूर्ण होती है |