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Sunday, 17 November 2013

beejakshara mantra Shri Ram Raksha Stotra

श्री राम रक्षा स्त्रोत्रम्

Lord Ram
श्रीरामरक्षास्तोत्रम् बुधकौशिक नामक ऋषि द्वारा रचित है और यह भगवान श्रीराम की स्तुति में रचा गया है।

माता सीता और भगवान श्रीराम कि स्तुति हेतु इस स्त्रोत्र का जाप किया जाता है |  तथा श्रीरामचन्द्र जी की प्रसन्नता के लिये रामरक्षास्तोत्र के जप में विनियोग किया जाता है।

इस स्त्रोत्र के बारे में शास्त्रों में यह तक कहा जाता है कि जो कोई भी इस स्त्रोत्र को कंठ में धारण कर लेता है अर्थात कंठस्थ कर लेता है, उसको सभी सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती है |

यह स्त्रोत्र किसी भी प्रकार कि बाधाओं और समस्याओं से छुटकारा दिलाने कि अद्भुत क्षमता रखता है | अत: जपकर्ता को पूर्ण श्रृद्धा और समर्पण भाव से इस स्त्रोत्र का जाप करना चाहिए | तथा भगवान श्रीराम, माता सीता और हनुमान जी को मन और चित्त में स्थापित कर इस स्त्रोत्र का ध्यान करने वाले निश्चित ही सभी बाधाओं एवं विपत्तियों से छुटकारा पाते है |


विनियोग

ॐ अस्य श्रीरामरक्षास्तोत्रमन्त्रस्य बुधकौशिक ऋषिः श्री सीतारामचन्द्रो देवता अनुष्टुप्‌ छन्दः सीता शक्तिः श्रीहनुमान्‌ कीलकम् श्रीरामचन्द्रप्रीत्यर्थे रामरक्षास्तोत्रजपे विनियोगः।

अथ ध्यानम्‌

ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्धपद्मासनस्थं पीतं वासो वसानं नवकमलदलस्पर्धिनेत्रं प्रसन्नम्‌। वामाङ्कारूढसीतामुखकमलमिलल्लोचनं नीरदाभं नानालङ्कारदीप्तं दधतमुरुजटामण्डलं रामचन्द्रम्॥

अथ स्तोत्रम्

चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम्‌।
एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम्‌॥1॥

ध्यात्वा नीलोत्पलश्यामं रामं राजीवलोचनम्‌।
जानकीलक्ष्मणोपेतं जटामुकुटमण्डितम्‌ ॥2॥

सासितूणधनुर्बाणपाणिं नक्तंचरान्तकम्‌।
स्वलीलया जगत्त्रातुमाविर्भूतमजं विभुम्‌ ॥3॥

रामरक्षां पठेत्प्राज्ञः पापघ्नीं सर्वकामदाम्‌।
शिरो मे राघवः पातु भालं दशरथात्मजः ॥4॥

कौसल्येयो दृशौ पातु विश्वामित्रप्रियः श्रुती।
घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सलः॥5॥

जिह्वां विद्यानिधिः पातु कण्ठं भरतवन्दितः।
स्कंधौ दिव्यायुधः पातु भुजौ भग्नेशकार्मुकः॥6॥

करौ सीतापतिः पातु हृदयं जामदग्न्यजित्‌।
मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिं जाम्बवदाश्रयः॥7॥

सुग्रीवेशः कटी पातु सक्थिनी हनुमत्प्रभुः।
उरू रघूत्तमः पातु रक्षःकुलविनाशकृत्‌॥8॥

जानुनी सेतुकृत्पातु जङ्घे दशमुखान्तकः।
पादौ विभीषणश्रीदः पातु रामोऽखिलं वपुः॥9॥

एतां रामबलोपेतां रक्षां यः सुकृती पठेत्‌।
स चिरायुः सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत्‌॥10॥

पातालभूतलव्योमचारिणश्छद्मचारिणः ।
न दृष्टुमति शक्तास्ते रक्षितं रामनामभिः ॥11॥

रामेति रामभद्रेति रामचन्द्रेति वा स्मरन्‌।
नरो न लिप्यते पापैर्भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति ॥12॥

जगज्जैत्रैकमन्त्रेण रामनाम्नाभिरक्षितम्‌।
यः कण्ठे धारयेत्तस्य करस्थाः सर्वसिद्धयः ॥13॥

वज्रपञ्जरनामेदं यो रामकवचं स्मरेत्‌।
अव्याहताज्ञः सर्वत्र लभते जयमङ्गलम्‌ ॥14॥

आदिष्टवान्यथा स्वप्ने रामरक्षामिमां हरः।
तथा लिखितवान्प्रातः प्रबुद्धो बुधकौशिकः ॥15॥

आरामः कल्पवृक्षाणां विरामः सकलापदाम्‌।
अभिरामस्त्रिलोकानां रामः श्रीमान्सनः प्रभुः ॥16॥

तरुणौ रूप सम्पन्नौ सुकुमारौ महाबलौ।
पुण्डरीकविशालाक्षौ चीरकृष्णाजिनाम्बरौ ॥17॥

फलमूलाशिनौ दान्तौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ।
पुत्रौ दशरथस्यैतौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥18॥

शरण्यौ सर्वसत्त्वानां श्रेष्ठौ सर्वधनुष्मताम्‌।
रक्षःकुलनिहन्तारौ त्रायेतां नो रघूत्तमौ ॥19॥

आत्तसज्जधनुषाविषुस्पृशावक्षयाशुगनिषङ्गसङ्गिनौ।
रक्षणाय मम रामलक्ष्मणावग्रतः पथि सदैव गच्छताम्‌॥20॥

सन्नद्धः कवची खड्गी चापबाणधरो युवा।
गच्छन्मनोरथान्नश्च रामः पातु सलक्ष्मणः ॥21॥

रामो दाशरथिः शूरो लक्ष्मणानुचरो बली।
काकुत्स्थः पुरुषः पूर्णः कौसल्येयो रघूत्तमः ॥22॥

वेदान्तवेद्यो यज्ञेशः पुराणपुरुषोत्तमः।
जानकीवल्लभः श्रीमानप्रमेयपराक्रमः ॥23॥

इत्येतानि जपन्नित्यं मद्भक्तः श्रद्धयाऽन्वितः।
अश्वमेधाधिकं पुण्यं सम्प्राप्नोति न संशयः ॥24॥

रामं दूवार्दलश्यामं पद्माक्षं पीतवाससम्‌।
स्तुवन्ति नामभिर्दिव्यैर्न ते संसारिणो नराः ॥25॥

रामं लक्ष्मणपूर्वजं रघुवरं सीतापतिं सुन्दरं
काकुत्स्थं करुणार्णवं गुणनिधिं विप्रप्रियं धार्मिकम्‌।
राजेन्द्रं सत्यसंधं दशरथतनयं श्यामलं शान्तमूर्तिं
वन्दे लोकाभिरामं रघुकुलतिलकं राघवं रावणारिम्‌॥26॥

रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे।
रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः ॥27॥

श्रीराम राम रघुनन्दन राम राम,
 श्रीराम राम भरताग्रज राम राम।
श्रीराम राम रणकर्कश राम राम,
श्रीराम राम शरणं भव राम राम ॥28॥

श्रीरामचन्द्रचरणौ मनसा स्मरामि,
श्रीरामचन्द्रचरणौ वचसा गृणामि।
श्रीरामचन्द्रचरणौ शिरसा नमामि,
श्रीरामचन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये ॥29॥

माता रामो मत्पिता रामचन्द्रः,
 स्वामी रामो मत्सखा रामचन्द्रः।
सर्वस्वं मे रामचन्द्रो दयालु-र्नान्यं
जाने नैव जाने न जाने ॥30॥

दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य वामे तु जनकात्मजा।
पुरतो मारुतिर्यस्य तं वन्दे रघुनन्दनम्‌ ॥31॥

लोकाभिरामं रणरङ्धीरं,
राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम।
कारुण्यरूपं करुणाकरं तं,
श्रीरामचन्द्रं शरणं प्रपद्ये ॥32॥

मनोजवं मारुततुल्यवेगं
जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्‌।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं
श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये ॥33॥

कूजन्तं राम रामेति मधुरं मधुराक्षरम्‌।
आरुह्य कविताशाखां वन्दे वाल्मीकिकोकिलम्‌ ॥34॥

आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसम्पदाम्‌।
लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम्‌ ॥35॥

भर्जनं भवबीजानामर्जनं सुखसम्पदाम्‌।
तर्जनं यमदूतानां राम रामेति गर्जनम्‌ ॥36॥

रामो राजमणिः सदा विजयते रामं रामेशं भजे
रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नमः।
रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोऽस्म्यहं
रामे चित्तलयः सदा भवतु मे भो राम मामुद्धर ॥37॥

राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे।
सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने ॥38॥

इति श्रीबुधकौशिकमुनिविरचितं श्रीरामरक्षास्तोत्रं सम्पूर्णम्

जपविधि:- जपकर्ता को इस स्त्रोत्र का ध्यान  करने से पूर्व शुद्ध आसन तथा पूर्व या उत्तर दिशा कि ओर  मुंह कर, श्रीराम दरबार के सम्मुख बैठना चाहिए | तत्पश्चात श्री राम का स्मरण कर इस स्त्रोत्र को प्रारंभ करना चाहिए |

इस स्त्रोत्र को विशेषतयः नवरात्र में करने से यह अधिक फलदायी होता है | इस स्त्रोत्र को रक्षा कवच भी कहा जाता है और यह स्त्रोत्र प्रत्येक प्रकार से जपकर्ता की रक्षा करता है | 

Thursday, 14 November 2013

beejakshara mantra Dwadash Jyotirlinga Strotram (In Hindi)


द्वादशं ज्योतिर्लिङ्गानि (हिंदी में)

Shiv Temple
सोमनाथ सौराष्ट्र में, काशी में विश्वेश |
महाकाल उज्जैन में, शिवालय घुश्मेश ||


भीमशंकर डाकिनी, सेतुबंध रामेश |
त्रयम्बकं गोमती तीर पर, दारुकवन नागेश ||

मल्लिकार्जुन श्रीशैल पर, हिमगिरी पर केदार |
चिता भूमि स्थान में वैद्यनाथ भवहार ||


ओंकार ममलेश्वर में रेवातट दोए नाम |
द्वादशज्योर्लिंग को सदा करूँ प्रणाम ||


श्रद्धा सहित जो ध्यावही निशदिन में दो बार |
सर्वपाप से मुक्त हो, पावे सिद्दी अपार ||

भगवान महादेव के इस द्वादश स्त्रोत्र को जो कोई भी भक्त पूर्ण श्रद्धा से ओर निष्काम भाव से प्रयेक दिन सुबह व शाम को भजता है या स्मरण करता है वह सभी प्रकार के पापों से मुक्त हो जाता है, व शिव भक्तों को चाहिये कि प्रत्येक सोमवार को काशी की तरफ मुख कर इस स्त्रोत्र का जाप करे व इस स्त्रोत्र निरन्तर जाप करने से सर्वसिद्धि की प्राप्ति होती है |

Wednesday, 13 November 2013

beejakshara mantra Shiva Dvadasha Jyotirlinga Stotram (In Sanskrit)

!! द्वादशं ज्योतिर्लिङ्गानि (संस्कृत में) !!

Kedarnath

सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम् |
उज्जयिन्यां महाकालमोङ्कारममलेश्वरम् ||1||


परल्यां वैद्यनाथं च डाकिन्यां भीमशंकरम् |
सेतुबन्धे तु रामेशं नागेशं दारुकावने ||२||

वाराणस्यां तु विश्वेशं त्रयम्बकं गौतमीतटे |
हिमालये तु केदारम् घुश्मेशं च शिवालये ||३||

एतानि ज्योतिर्लिंगानि सायंप्रातः पठेन्नरः |
सप्तजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति ||4||

Click Here to Listen the Video of 12 Jyotirligas

 
 

भगवान शंकर  के  इस 12 (द्वादश) ज्योतिर्लिंगों  का  स्मरण प्रत्येक दिन जो कोई भी सांय अर्थात संध्या के  समय  व प्रात निष्काम भाव से करता  है,  उसके  सात जन्म तक  किये हुए पापों का का विनाश भी इस स्त्रोत्र का स्मरण करते ही ही हो जाता है । और उस भक्त के सब पाप नष्ट होकर उसको सर्व सिद्धि को प्राप्त होती है ।

Saturday, 9 November 2013

beejakshara mantra Shiva Panchakshara Stotram (Shiva Mahima)

!! शिव पञ्चाक्षर स्तोत्रम् !!


नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय,
  भस्माङ्गरागाय महेश्वराय |
  नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय,  
          तस्मे 'न' काराय नमः शिवाय |1||


    मन्दकिनीसलिलचन्दन्चर्चिताय,
नन्दिश्वरप्रमथनथामहेश्वराय |
मन्दारपुष्पबहुपुष्पसुपुजिताय, 
   तस्मै 'म' काराय नमः शिवाय |2||

शिवाय गोरीवदनाब्जवृन्द,  
सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय |
   श्री नीलकण्ठाय वृषध्वजाय , 
           तस्मै 'शि' काराय नमः शिवाय |3||

वशिष्ठकुम्भोद्भव गौत्मार्य ,
मुनीन्द्रदेवार्चितशेखराय |
चन्द्रार्कवैश्वानरलोचनाय, 
          तस्मै 'व' काराय नमः शिवाय |4||

य (क्ष) ज्ञस्वरूपाय जटाधराय, 
पिनाकहस्ताय सनातनाय |
दिव्याय देवाय दिगम्बराय, 
        तस्मै 'य' काराय नमः शिवाय |5||

पन्चाक्षरमिदं पुण्यं यः  पठेच्छिवसन्निधौ |
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते ||

!! इति !!

Click here to watch the video of "Shiva Panchakshar Stotra"


इस स्तोत्र का सात सोमवार तक  भगवान शिव के सम्मुख घी का दीपक जलाकर, पूर्वाभिमुख होकर या काशी कि तरफ मुख करके पंच बार पाठ करने पर सर्वसिद्धि प्राप्त होती है |

Friday, 1 November 2013

beejakshara mantra Govind Damodar Strotram

!! गोविंद दामोदर स्तोत्र !!

करारविन्देन पदारविन्दं 
मुखारविन्दे विनिवेशयन्तं |
वटस्य पत्रस्य पुटे शयानं 
बाल मुकन्दं मनसा स्मरामि ||1||

श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे 
हे नाथ नारायण वासुदेव |
जिव्हे पिब्स्वामृतमेतदेव 
गोविन्द दामोदर माधवेति ||2||

विक्रेतुकामा किल गोपकन्या 
मुरारिपादार्पितचित्तवृति: |
दध्यादिकं मोहवशादवोचद्
गोविन्द दामोदर माधवेति |3||

गृहे गृहे गोपवधुकदंबा:
सर्वे मिलित्वा समवाप्य योगं |
पुण्यानि नामानि पठन्ति नित्य 
गोविन्द दामोदर माधवेति ||4|| 

सुख शयना निलये निजेअपि 
नामानि विष्णोः प्रवदन्ति मत्:र्या: |
ते निश्चितं तन्मयतां व्रजदन्ति 
गोविन्द दामोदर माधवेति ||5||

जिव्हे सदैवं भज सुन्दराणि 
नामानि कृष्णस्य मनोहराणि |
समस्त भक्तार्तिविनाशनानि
गोविन्द दामोदर माधवेति ||6||

सुखावसाने इदमेव सारं 
दुःखावसाने इदमेव ज्ञेयम |
देहावसाने इदमेव जाप्यं 
गोविन्द दामोदर माधवेति ||7||

श्रीकृष्ण राधावर गोकुलेश 
गोपाल गोवर्धननाथ विष्णो |
जिव्हे पिब्स्वामृतमेतदेव 
गोविन्द दामोदर माधवेति ||8||

(इति सम्पूर्णं)

Click here to watch video of this Strotra


इस स्तोत्र का जाप रोज संध्या करते समय करना चाहिए, इसका नित्य जाप करने से भगवान गोविन्द (कृष्ण) की कृपा होती है और पारिवारिक क्लेशो से छुटकारा मिलता है, व घर व परिवार में शान्ति बनी रहती है |

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